{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Torch | Manglesh Dabral","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/43ad3386\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":157,"description":"टॉर्च | मंगलेश डबराल \n\nमेरे बचपन के दिनों में\nएक बार मेरे पिता एक सुन्दर-सी टॉर्च लाए\nजिसके शीशे में खाँचे बने हुए थे\nजैसे आजकल कारों की हेडलाइट में होते हैं।\nहमारे इलाके  में रोशनी की वह पहली मशीन थी\nजिसकी शहतीर एक\nचमत्कार की तरह रात को दो हिस्सों में बाँट देती थी\nएक सुबह मेरे पड़ोस की एक दादी ने पिता से कहा \nबेटा,  इस मशीन से चूल्हा जलाने के लिए थोड़ी सी आग दे दो \nपिता ने हँस कर कहा चाची इसमें आग नहीं होती सिर्फ़ उजाला होता है\nइसे रात होने पर जलाते हैं\nऔर इससे पहाड़ के ऊबड़-खाबड़ रास्ते साफ़ दिखाई देते हैं\nदादी ने कहा उजाले में थोड़ा आग भी होती तो कितना अच्छा था\nमुझे रात से ही सुबह का चूल्हा जलाने की फ़िक्र रहती है\nपिता को कोई जवाब नहीं सुझा वे ख़ामोश रहे देर तक\nइतने वर्ष बाद वह घटना टॉर्च की वह रोशनी\nआग माँगती दादी और पिता की ख़ामोशी चली आती है\nहमारे वक्त की विडम्बना में कविता की तरह।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}