{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Manch Se | Vaibhav Sharma ","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/43fd515b\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":162,"description":"मंच से | वैभव शर्मामंच के एक कोने से शोर उठता है और रोशनी भीसामने बैठी जनता डर से भर जाती है।मंच से बताया जाता है शांती के पहले जरूरी है क्रांतितो सामने बैठी जनता जोश से भर जाती है।शोर और रोशनी की ओर बढ़ती है।डरी हुई जनताखड़े होते हैं हाथ और लाठियांखड़ी होती है डरी हुई भयावह जनताडरी हुई भीड़ बड़ी भयानक होती है।डरे हुए लोग अपना डर मिटाने हेतुकाट सकते हैं अपने ही अंगडर मिटाने के लिए अंग काटने का चलन आया है।मंच के दूसरे कोने से अटृहासखून की बौछारशोर खूंखार, भयावह आकृतियां अपारजनता डरी और सहमी, खड़ी हाथ में लिएतीखे नुकीले कटीले हथियारडरी हुई जनता, अंगो को काटकरडर को छांट छांट कर अलग करतीफिर भी डरा करती, निरन्तरडरी हुई जनता, मंच के नीचे सेऊपर वालों को तकतीपर उनके पास ना दिखे उसको कोई हथियारमंच पे दिखे, सुशील मुखी, सुन्दर, चरित्रवानएवं मोहक कलाकारडरी सहमी, खून से लथपथ जनतादेखती शोर और अट्हास के बीचसमूचे निगले जाते अपने अंग हज़ार।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}