{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Pani Kya Keh Raha Hai - Naresh Saxena","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/44e9b0a7\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":237,"description":"आज की हमारी कविता है 'पानी क्या कर रहा है'। इसे लिखा है नरेश सक्सेना जी ने।सुनिए यह कविता उन्ही के आवाज़ में।\nइंजीनियरिंग के विद्यार्थी रहे नरेश सक्सेना जी की कविताएँ यथार्थ के धरातल से शुरू होती हैं और मानवीय भावों को टटोलती हैं। उनकी बहुत सी कविताएँ स्कूल और कॉलेज के पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं। नरेश जी को साहित्य भूषण समेत कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाज़ा गया है। \n\nकविता - \n\nआज जब पड़ रही है कड़ाके की ठंड\nऔर पानी पीना तो दूर\nउसे छूने तक से बच रहे हैं लोग\nतो ज़रा चल कर देख लेना चाहिए\nकि अपने संकट की इस घड़ी में\nपानी क्या कर रहा है\n\nअरे! वह तो शीर्षासन कर रहा है\nसचमुच झीलों, तालाबों और नदियों का पानी\nसिर के बल खड़ा हो रहा है\nसतह का पानी ठंडा और भारी हो\nलगाता है डुबकी\nऔर नीचे से गर्म और हल्के पानी को\nऊपर भेज देता है ठंड से जूझने\nइस तरह लगातार लगाते हुए डुबकियाँ\nउमड़ता-घुमड़ता हुआ पानी\nजब आ जाता है चार डिग्री सेल्सियस पर\n\nयह चार डिग्री क्या?\nयह चार डिग्री वह तापक्रम है दोस्तो,\nजिसके नीचे मछलियों का मरना शुरू हो जाता है\nपता नहीं पानी यह कैसे जान लेता है\nकि अगर वह और ठंडा हुआ\nतो मछलियाँ बच नहीं पाएँगी\n\nअचानक वह अब तक जो कर रहा था\nठीक उसका उल्टा करने लगता है\nयानी और ठंडा होने पर भारी नहीं होता\nबल्कि हल्का होकर ऊपर ही तैरता रहता है\nतीन डिग्री हल्का\nदो डिग्री और हल्का और\nशून्य डिग्री होते ही, बर्फ़ बन कर\nसतह पर जम जाता है\n\nइस तरह वह कवच बन जाता है मछलियों का\nअब पड़ती रहे ठंड\nनीचे गर्म पानी में मछलियाँ\nजीवन का उत्सव मनाती रहती हैं\nइस वक़्त शीत कटिबंधों में\nतमाम झीलों और समुद्रों का पानी जम कर\nमछलियों का कवच बन चुका है\n\nपानी के प्राण मछलियों में बसते हैं\nआदमी के प्राण कहाँ बसते हैं, दोस्तो\n\nइस वक़्त\nकोई कुछ बचा नहीं पा रहा\nकिसान बचा नहीं पा रहा अन्न को\nअपन हाथों से फ़सलों को आग लगाए दे रहा है\nमाताएँ बचा नहीं पा रहीं बच्चे\nउन्हें गोद में ले\nकुओं में छलाँगें लगा रही हैं\n\nइससे पहले कि ठंडे होते ही चले जाएँ\nहम, चल कर देख लें\nकि इस वक़्त जब पड़ रही है कड़ाके की ठंड\nतब मछलियों के संकट की इस घड़ी में\nपानी क्या कर रहा है।\n\nप्रतिदिन एक कविता Whatsapp लिंक\nhttps://chat.whatsapp.com/HaxCc1qgeZaGE8YPfw42Ge\n ","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}