{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Vimanspardhi | Gyanendrapati","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/467e89bb\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":157,"description":" विमानस्पर्धी।  ज्ञानेन्द्रपति खगपथों परपक्षियों से जा टकराते हैं विमान, अन्धाधुन्दऔर ध्वन्स का ज़िम्मेदारपक्षी को ठहराया जाता हैबेसबब बेसब्र चील कोदूर धरती के एक कसाईखाने की धुरी पर गगन मँडराते गिद्ध कोजबकि वेखगपथों को मेघपथों से जोड़ने वाली आकासी सिवान पर तारापथ जहाँ से दीख जाता दिन में ही उन्हें -अंक रही अंतिम उड़ानें हैं पक्षीकुल कीजिन्हेंविमान-कम्पनियों और बीमा-कम्पनियों का अभिशाप-किन्हीं का लाभ  नीचे, धरती पर, कीटनाशकों का ज़हर  बनकर मार रहा हैउनके अण्डों को तुनुक बनाकर तोड़ रहा है, असमयघोंसलों में ही बुझा दे रहा है जीवन-जोत, भ्रूण का अनबना गला टीपकरखेचर प्रजातियों को पोंछ रहा है आकाश सेपंख-भर आकाश के आश्वासन के साथ जिन्हें उपजाया था धरती नेभेजा था आकाश की सैर परजिनके लौट आने काइंतज़ार करती है धरतीऊँचे वृक्षों की फुनगियों में रोपे कानएक बिमान के गर्म लहू से गीली-झुलसी धरतीउस पक्षी का भी शोक करती हैजो लहू की एक बूँद बन चू पड़ावह आकाश का आँसू नहींधरती की उमंग था ।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}