{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Ek Ashwasti - Halki Phulki | Prem Vats","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/470199ae\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":289,"description":"एक आश्वस्ति - हल्की फुलकी | प्रेम वत्स \n\nएक हल्का घुला हुआ गुलाबीपन\nपंखुरियों की भाँति चिपक-सा जाता है\nउसके हल्के रोंयेदार गालों के दोनों उट्ठलों से\nजो हल्का-सा भी अप्रत्याशित होने पर\nउठ खड़े होते हैं खरगोशी कान जैसे\nप्रेम में अक्सर\n\nउसे भी तुम प्रेम ही कहो\nजब वह अपनी ठुड्ढी पर तड़के आए\nहल्के नर्म बालों को वजह-बेवजह\nअपनी उंगलियों से पुचकारता रहता है\nऔर ख़यालों में खोए उस महाशय से\nजब तुम कुछ पूछते हो \nतो वह फिर से नापने लगता है\nउन दाढ़ियों को इंच-दर-इंच\nजिन्हें अब तक दाढ़ी कह पाना भी\nएक अतिशयोक्ति है\n\nवह हताश होकर खट्ट-से बैठ जाता है\nगौर करो इतनी जोर की हताशा\nउसे कभी नहीं आई\nयह उतनी ही जोर की है\nजितनी जोर की हँसी छूटी थी उसकी\nकलप-कलप के रोने के घंटों बाद उस रोज\n\nवह आज भी प्रेम में है...\nइसलिए अपनी भावनाओं को\nस्पर्श कर सकने की\nसबसे निकटतम दूरी पर है\nऔर शायद इसलिए\nहर्ष और विषाद के उन क्षणों में\nवह सबसे कुशल अभिव्यंजक होता है\nइतना कुशल कि आँसूओं के आगे\nजो तुम रखते हो कोरा कागज\nतो रच जाता है अनंत सर्गों का महाकाव्य\nऔर उसके अट्टहासों और चित्कारों पर\nजब तुम कान धरते हो\nतो सुन पाते हो\nअपनी सदी के सबसे मधुरतम संगीत को\n\nप्रेम में उसके विलाप\nउतने ही कर्णप्रिया होते हैं\nजितने ज्यादा कर्कश\nतुम्हारे कौमी रक्षक नेताओं के\nबहिष्कारी प्रवचन तुम्हें लगते हैं\n\nतुमने उसके चेहरे की\nअस्पष्ट भंगिमाएं देखीं हैं\nउनमें कितनी अपार संभावनाएं हैं\nअर्थ को बहुलता प्रदान करने की\nतुम्हारे पर्दे पर का सर्वश्रेष्ठ नायक भी\nअब एक आयामी अभिनय करने लगा है\nतुमने गौर किया है इस बात पर?\n\nउसकी मुद्राओं से बहकर गिरता है शृंगार\nजब-जब भी वह स्पर्श करता है\nतुम्हारे अंतःस्थल के भी निचले तल को\nकितने सत्-चित्त-आनंद की\nआमद होती है तुममें\nतुमने टटोला है खुद को\nइस धरा पर अपने सबसे ज्यादा\nमत्त हुए क्षणों में\n\nतुम उन अप्रत्याशित क्षणों में\nएकदम बेडौल-से लगते हो\nकोई चीन्हा-पहचाना भी तुम्हें\nअनचीन्हा बता जायेगा\nइतने वीभत्स दिखते हो तुम\nक्या उन क्षणों में तुमने अपने अधरों पर\nशहद जैसा कुछ महसूस किया है?\nवह.. वही है..\nतुम्हारे सबसे अनाकर्षक\nपर सबसे ज्यादा मानवीय गंध में\nतुम्हें सब से अधिक\nअपनी साँसों में भर लेने वाला\n.\nप्रेम में अक्सर\nअप्रत्याशा ही हाथ लगती है\nजब भी प्रेम\nअपने गर्भावस्था में पक रहा होता है\nदो नाज़ुक शावकों...","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}