{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Jarkhareed Deh | Rupam Mishra","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/47f8f729\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":182,"description":" जरखरीद देह - रूपम मिश्र \n\nहम एक ही पटकथा के पात्र थे\nएक ही कहानी कहते हुए हम दोनों अलग-अलग दृश्य में होते\nजैसे एक दृश्य तुम देखते हुए कहते तुमसे कभी मिलने आऊँगा\nतुम्हारे गाँव तो नदी के किनारे बैठेंगे जी भर बातें करेंगे\nतुम बेहया के हल्के बैंगनी फूलों की अल्पना बनाना\nउसी दृश्य में तुमसे आगे जाकर देखती हूँ \nनदी का वही किनारा है बहेरी आम का वही पुराना पेड़ है।\nजिसके तने को पकड़कर हम छुटपन में गोल-गोल घूमते थे।\nउसी की एक लम्बी डाल पर दो लाशें झूल रही हैं ।\nएक मेरी हैं दूसरी का बस माथा देखकर ही  मैं\nचीख पड़ती हूँ और दृश्य से भाग आती हूँ\nतुम रूमानियत में दूसरा दृश्य देखते हो\nकिसी शाम जब आकाश के थाल में तारे बिखरे होंगे\nसंसार मीठी नींद में होगा तो चुपके से तुमसे मिलने आ जाऊँगा\nमैं झट से बचपन में चली जाती हूँ जहाँ दादी भाई को गोद में लिये\nरानी सारंगा और सदावृक्ष की कहानी सुना रही हैं\nमैं सीधे कहानी के क्लाइमेक्स में पहुँचती हूँ\nजहाँ रानी सारंगा से मिलने आए प्रेमी का गला खचाक से काट दिया जाता है\n\nऔर छोटा भाई ताली पीटकर हँसने लगता है\nदृश्य और भी था जिसमें मेरा चेहरा नहीं था देहों से भरा एक मकान था\nमैं एक अछूत बर्तन की तरह घर के एक कोने में पड़ी थी\nतुम और भी दृश्य बताते हो जिसमें समन्दर बादल और पहाड़ होते हैं\nमैं कहती हूँ कहते रहो ये सुनना अच्छा लग रहा है\nबस मेरे गाँव-जवार की तरफ न लौटना क्योंकि\nये आत्मा प्रेम की जरखरीद है और देह कुछ देहों की।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}