{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Dharti ka Shaap | Anupam Singh","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/4a8a1ae7\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":147,"description":"धरती का शाप | अनुपम सिंह\n\nमौत की ओर अग्रसर है धरती \nमुड़-मुड़कर देख रही है पीछे की ओर \nउसकी आँखें खोज रही हैं \nआदिम पुरखिनों के पद-चिह्न \nउन सखियों को खोज रही हैं \nजिनके साथ बड़ी होती \nफैली थी गंगा के मैदानों तक\n\nउसकी यादों में घुल रही हैं मलयानिल की हवाएँ \nजबकि नदियाँ मृत पड़ी हैं \nउसकी राहों में \nनदियों के कंकाल बटोरती \nमौत की ओर अग्रसर है धरती\n\nवह ले जा रही है अपने बचे खुचे पहाड़ \nअपने बटुए में रख लिये जंगल और घास के मैदान \nअपनी बची हुई सारी चिड़ियाएँ \nउड़ा रही है तुम्हारे बन्द पिंजड़े से\n\nझील-झरना-ताल-तलैया—\nसब रख लिया है अपने लोटे में \nपेड़ों को कंधे पर रख\n\nअपना सारा बीज बटोर \nमौत की ओर अग्रसर है धरती\n\nगरीबचंद की बेटियाँ झुकी हुई हैं निवेदन में \nउसे रोकती, \nबुहार रही हैं उसकी राह \nजबकि उसके महान पुत्र \nउसके तारनहार \nअब भी चिमटे हैं उसकी छाती से\n\nयदि अन्तिम क्षण भावुक नहीं हुई वह \nजैसे माँएँ होती हैं\n तो माफ़ नहीं करेगी \nपलटकर शाप देगी धरती।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}