{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Adiyal Saans | Kedarnath Singh","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/4d2bf980\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":182,"description":"अड़ियल साँस | केदारनाथ सिंह\n\nपृथ्वी बुख़ार में जल रही थी\nऔर इस महान पृथ्वी के\nएक छोटे-से सिरे पर\nएक छोटी-सी कोठरी में\nलेटी थी वह\nऔर उसकी साँस\nअब भी चल रही थी\nऔर साँस जब तक चलती है\nझूठ\nसच\nपृथ्वी\nतारे - सब चलते रहते हैं\nडॉक्टर वापस जा चुका था\nऔर हालाँकि वह वापस जा चुका था\nपर अब भी सब को उम्मीद थी\nकि कहीं कुछ है।\nजो बचा रह गया है नष्ट होने से\nजो बचा रह जाता है\nलोग उसी को कहते हैं जीवन\nकई बार उसी को\nकाई\nघास\nया पत्थर भी कह देते हैं लोग\nलोग जो भी कहते हैं\nउसमें कुछ न कुछ जीवन\nहमेशा होता है।\nतो यह वही चीज़ थी\nयानी कि जीवन\nजिसे तड़पता हुआ छोड़कर\nचला गया था डॉक्टर\nऔर वह अब भी थी\nऔर साँस ले रही थी उसी तरह\nउसकी हर साँस\nहथौड़े की तरह गिर रही थी\nसारे सन्नाटे पर\nठक-ठक बज रहा था सन्नाटा\nजिससे हिल उठता था दिया\nजो रखा था उसके सिरहाने\nकिसी ने उसकी देह छुई \nकहा - 'अभी गर्म है'।\nलेकिन असल में देह या कि दिया\nकहाँ से आ रही थी जीने की आँच\nयह जाँचने का कोई उपाय नहीं था\nक्योंकि डॉक्टर जा चुका था\nऔर अब खाली चारपाई पर\nसिर्फ़ एक लंबी\nऔर अकेली साँस थी\nजो उठ रही थी\nगिर रही थी\nगिर रही थी\nउठ रही थी..\nइस तरह अड़ियल साँस को\nमैंने पहली बार देखा\nमृत्यु से खेलते\nऔर पंजा लड़ाते हुए\nतुच्छ\nअसह्य\nगरिमामय साँस को\nमैंने पहली बार देखा\nइतने पास से","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}