{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Dharti Ka Pehla Premi | Bhawani Prasad Mishra","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/4e2e7f6c\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":162,"description":"धरती का पहला प्रेमी ।  भवानीप्रसाद मिश्र\n\nएडिथ सिटवेल ने\nसूरज को धरती का\nपहला प्रेमी कहा है\n\nधरती को सूरज के बाद\nऔर शायद पहले भी\nतमाम चीज़ों ने चाहा\n\nजाने कितनी चीज़ों ने\nउसके प्रति अपनी चाहत को\nअलग-अलग तरह से निबाहा\n\nकुछ तो उस पर\nवातावरण बनकर छा गए\nकुछ उसके भीतर समा गए\nकुछ आ गए उसके अंक में\n\nमगर एडिथ ने\nउनका नाम नहीं लिया\nठीक किया मेरी भी समझ में\n\nप्रेम दिया उसे तमाम चीज़ों ने\nमगर प्रेम किया सबसे पहले\nउसे सूरज ने\n\nप्रेमी के मन में\nप्रेमिका से अलग एक लगन होती है\nएक बेचैनी होती है\nएक अगन होती है\nसूरज जैसी लगन और अगन\nधरती के प्रति\nऔर किसी में नहीं है\n\nचाहते हैं सब धरती को\nअलग-अलग भाव से\nउसकी मर्ज़ी को निबाहते हैं\nखासे घने चाव से\n\nमगर प्रेमी में\nएक ख़ुदगर्ज़ी भी तो होती है\nदेखता हूँ वह सूरज में है\n\nरोज़ चला आता है\nपहाड़ पार कर के\nउसके द्वारे\nऔर रुका रहता है\nदस-दस बारह-बारह घंटों\n\nमगर वह लौटा देती है उसे\nशाम तक शायद लाज के मारे\n\nऔर चला जाता है सूरज\nचुपचाप\nटाँक कर उसकी चूनरी में\nअनगिनत तारे\nइतनी सारी उपेक्षा के\nबावजूद।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}