{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Pita - Uday Prakash","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/4e4f8621\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":195,"description":"पिता - उदय प्रकाश\nपिता झाड़-झंखाड़, घाटियों और पत्थरों से भरे \nचटियल मैदान थे। \nपिता सागौन, शीशम, बबूल, तेंदुओं और हिरनों से भरे \nबीहड़ थे। \nबचपन में अक्सर \nकिसी ऊँचे टीले पर चढ़ कर \nमैं आस-पास के गाँवों में \nललकार दिया करता था \nनाके के पार \nशहर तक में \nपिता का रोब था। \nएक-एक इमारत पर \nउनकी कन्नियाँ सरकी थीं। \nएक-एक दीवार पर \nउनकी उँगलियों के निशान थे। \nहर दरवाज़े की काठ पर \nउनका रंदा चला था। \nनाके के इस पार \nजहाँ से गाँव की वीरानगी शुरू होती है \nहर खेत की कठोर छाती पर \nपिता अपनी कुदाल \nधँसा गए थे। \nहल की हर मूठ पर \nउनकी घट्ठेदार हथेलियों की छाप थी। \nहर गरियार बैल के पुट्ठों पर \nउनके डंडे के दाग थे... \nबचपन में \nपिता के कंधे पर बैठ कर \nमैं बाज़ार घूमने जाता था। \nपिता पहाड़ की तरह \nचलते भीड़ की तरह \nउनके कंधे पर मैं \nजंगली तोते की तरह बैठा रहता। \nबाद में पिता \nग़ायब हो गए \nकहते हैं खेल, कुदाल, \nबैल, इमारतें, ईंटे, दरवाज़े, बाज़ार \nउन्हें पचा गए। \nमुझे लगता है \nउस चटियल मैदान \nके भीतर (जो पिता थे) \nज़मीन की दूसरी-तीसरी परतों में। \nसरकता हुआ कोई \nनम सोता भी था \nजो मेहनत करते \nपिता की देह के अलावा \nकभी-कभी मेरी आँखों से भी \nरिसने लगता था। ","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}