{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Rishtedari | Laxmishankar Vajpeyi","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/4fbfd661\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":131,"description":"रिश्तेदारी | लक्ष्मीशंकर वाजपेयी\n\nनहीं, यह भी संभव नहीं होता\nकि उनके शहर जाकर भी\nजाया ही न जाय रिश्तेदारों के घर\nअकसर कुछ एहसान लदे होते हैं\nउनके बुज़ुर्गों  के अपने बुज़ुर्गों  पर\nऐसा कुछ न भी हो, तो\nज़रूरी होता है लोकाचार निभाना\nकिंतु अकसर खड़ी हो जाती है समस्या\nकि पत्नी की कुशलक्षेम, बच्चों की\nसुचारू पढ़ाई का विवरण दे देने\nतथा ’और क्या हाल-चाल हैं‘ का कई-कई बार\nउत्तर दे देने के बाद,\nकैसे जारी रखा जाय संवाद\nअकसर बोझिल हो जाते हैं\nचाय आने के बीच के क्षण,\nऔर अकसर देर लगती है चाय आने में\nक्योंकि उधर से भी रिश्तेदारी निभाने के प्रयास\nप्रकट होते हैं चाय के साथ की सामग्री बनकर\nचाय के बाद बनती है कुछ राहत की स्थिति\nकि अब कुछ देर बाद\nमाँगी जा सकती है आज्ञा\nऔर खाना खाकर जाने की मनुहार पर\nकुछ बहाने बनाकर\nउठा जा सकता है कुछ औपचारिक संबोधनों\nतथा फिर मिलने-जुलने\nया चिट्ठी लिखने के वादों के साथ!","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}