{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Bahurupiya | Madan Kashyap","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/5016b064\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":211,"description":"बहुरूपिया | मदन कश्यप जब वह पास आयातो पाँव में प्लास्टिक की चप्पल देखकर एकदम से हँसी फूट पड़ीफिर लगाभला कैसे संभव हैमहानगर की क्रूर सड़कों पर नंगे पाँव चलना चाहे वह बहुरूपिया ही क्यों न होवैसे उसने अपनी तरफ़ से कोशिश की थीदुम इतनी ऊँची लगायी थीकि वह सिर से काफ़ी ऊपर उठी दिख रही थीबाँस की खपच्चियों पर पीले काग़ज़ साटकर बनी गदाकमज़ोर भले हो चमकदार ख़ूब थीसिर पर गत्ते की चमकती टोपी थीचेहरे और हाथ-पाँव पर ख़ूब लाल रंग पोत रखा था लेकिन लाल लँगोटे की जगह धारीदार अंडरवियर और बदन में सफ़ेद बनियानउसकी पोल खोल रही थीउसने हनुमान का बाना धरा थापर इतने भर से भला क्या हनुमान लगता वह भी इस 'टेक्नो मेक-अप' के युग में जहाँ फ़िल्मों और टीवी सीरियलों में तरह-तरह के हनुमान उछलकूद करते दिखते रहते हैं वह भी समझ रहा था अपनी दिकदारियों कोतभी तो चाल में हनुमान होने की ठसक नहीं थी।बनने की विवशताऔर नहीं बन पाने की असहायता के बीच फँसा हुआ एक उदास आदमी था वह जो जीने का और कोई दूसरा तरीक़ा नहीं जानता थाइस बहुरूपिया लोकतन्त्र मेंकिसी साधारण तमाशागर के लिएबहुत कठिन है बहुरूपिया बनना और बने रहना जबकि निगमित हो रही है साम्प्रदायिकता प्रगतिशील कहला रहा है जातिवादसमृद्धि का सूचकांक बन गयी हैं किसानों की आत्महत्याएँ और आदिवासियों के खून से सजायी जा रही है भूमण्डलीकरण की अल्पनाबस केवल बहुरूपिया है जो बहुरूपिया नहीं है!","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}