{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Balshram | Pawan Sain Masoom","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/540ed597\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":202,"description":"बालश्रम| पवन सैन मासूम \nछणकु साफ़ कर रहा है चाय के झूठे गिलास\nइसलिए नहीं कि उसके नन्हें हाथ\nसरलता से पहुँच पा रहे हैं गिलास की तह तक\nबल्कि इसलिए कि\nउसके घर में भी हों झूठे बर्तन\nजो चमचमा रहे हैं एक अरसे से\nअन्न के अभाव में।\nदुकिया पहुँचा रहा है चाय\nठेले से दुकानों, चौकों तक\nइसलिए नहीं कि वह नन्हें पाँवों से तेज़ दौड़ता है\nबल्कि इसलिए कि\nउसके शराबी पिता के दौड़ते पाँवों की गति\nहो सके कुछ धीमी\nजो दौड़ते हैं अपनी पत्नी की तरफ़\nउससे पैसे न मिलने पर पीटने की ख़ातिर।\nबुझकू धूप अँधेरे कमरे में\nबना रहा है रंग-बिरंगी चूड़ियां\nइसलिए नहीं कि उसकी छोटी आँखों की तेज़ है रोशनी\nबल्कि इसलिए कि\nवह माँ-बाप के साये के बिना भी\nपढ़ा सके मुनिया को\nजिससे छँट सके कुटिया का अँधेरा\nऔर उनके काले जीवन में\nघुल सके कुछ खुशियों के रंग।\nशामली सेठ के यहाँ बना रही है रसोई\nऔर चमका रही है हवेली,\nइसलिए नहीं कि वह नौ वर्ष की आयु में ही\nहो चुकी है घरेलू कार्यों में निपुण\nबल्कि इसलिए कि\nहवेली में काम करके\nवह बचा सके माँ को कोठे के साये से\nख़ुद के सपनों को चोटिल करते हुए\nबचा सके माँ के शरीर को नुचने से।\nछणकु, दुकिया, बुझकू और शामली ही के जैसे\nन जाने और कितने बच्चे खप रहे हैं\nघरों, खेतों, दुकानों और कारखानों में,\nजो बचा रहे हैं अपने सपनों की कीमत पर\nअपनी छोटी सी दुनिया को।\nकितने गर्व की बात है ये\nआओ मिलकर बजाते हैं तालियाँ\nइन सबके सम्मान में।\nहम नपुंसक बन चुके लोग\nइसके अतिरिक्त कर भी क्या सकते है?","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}