{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Purkhon ka Dukh | Madan Kashyap","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/54e9b3b7\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":261,"description":"पुरखों का दुःख - मदन कश्यप \nदादा की एक पेटी पड़ी थी टीन की \nउसमें ढेर सारे काग़ज़ात के बीच \nजरी वाली एक टोपी भी थी\nज़र-ज़मीन के दस्तावेज़\nबँटवारे की लादाबियाँ...\nउनकी लिखावट अच्छी थी \nअपने ज़माने के ख़ासे पढ़े-लिखे थे दादा \nतभी तो कैथी नहीं नागरी में लिखते थे\nउनमें कोई भी दस्तावेज़ नहीं था दुख का \nदादा ने अपनी पीड़ाओं को कहीं भी दर्ज नहीं किया था \nउनके ऐश्वर्य की कुछ कथाएँ ज़रूर सुनाती थी दादी \nकि कैसे टोपी पहनकर \nहाथ में छड़ी लेकर \nनिकलते थे गाँव में दादा\nलेकिन दादी ने कभी नहीं बताया \nकि भादों में जब झड़ी लगती थी बरसात की \nऔर कोठी के पेंदे में केवल कुछ भूसा बचा रह जाता था\nतब पेट का दोज़ख भरने के लिए \nअन्न कैसे जुटाते थे दादा\nनदी और चौर-चाँचर से घिरे इस गाँव में \nअभी मेरे बचपन तक तो घुस आता था \nगंडक का पानी \nफिर दादा के बचपन में कैसा रहा होगा यह गाँव \nकैसी रही होगी यह नदी सदानीरा \nकभी जिसको पार करने से ही बदल गयी थी संस्कृति \nसभ्यता ने पा लिया था अपना नया अर्थ\nऔर कुछ भी तो दर्ज नहीं है कहीं \nफ़क़त कुछ महिमागानों के सिवा \nहम महान ज्ञात्रिक कुल के वंशज हैं \nहम ने ही बनाया था वैशाली का जनतंत्र \nकोई तीन हज़ार वर्षों से बसे हैं हम \nइस सदानीरा शालिग्रामी नारायणी के तट पर \nलेकिन यह किसी ने नहीं बताया है \nकि बाढ़ और वर्षा की दया पर टिकी \nछोटी जोत की खेती से कैसे गुज़ारा होता था पुरखों का \nक्या स्त्रियों और बेटियों को मिल पाता था भरपेट खाना\nबचपन में बीमार रहने वाले मेरे पिता \nबहुत पढ़-लिख भी नहीं पाये थे \nवे तो जनम से ही चुप्पा थे \nहर समय अपने सीने में \nनफ़रत और प्रतिहिंसा की आग धधकाये रहते थे \nऔर जो कभी भभूका उठता था\nतो पूरा घर झुलस जाता था\nउनकी पीड़ा थी कोशी की तरह प्रचंड बेगवती\nजिसे भाषा में बाँधने की कभी कोशिश नहीं की उन्होंने\nमैंने माँ की आँखों और पिता की चुप्पी में\nमहसूस किया था जिस दुख को\nअचानक उसे अपने रक्त में बहते हुए पाया\nकिसी भी अन्य नदी से ज़्यादा प्राचीन है वेदना की नदी\nजो समय की दिशा में बहती है\nपी़ढी-दर-पी़ढी पुश्त-दर-पुश्त!\nदुख का कारण और निदान ढूँढ़ने ही तो निकले थे बुद्ध\nवे तो मर-खप ही जाते ढोंगेश्वर की गुफाओं में\nकि उनके दुख को करुणा में बदल दिया\nसुजाता की खीर ने!","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}