{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Tumhare Bagair Ladna | Vihaag Vaibhav","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/568e9523\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":171,"description":"तुम्हारे बग़ैर लड़ना  | विभाग वैभव \n\nतुम्हारे जाने के बाद\nमैं राह के पत्थर जितना अकेला रहा\nफिर एक दिन सिसकियों को एक खाली कैसेट में डालकर\nकिताबों के बीच छिपा दिया\nबहुत से लोग थे जिन्हें फूलों की ज़रुरत थी\nमैंने माली का काम किया\nकिसी कमज़ोर के खेत का पानी\nकिसी ने लाठी के दम पर काट लिया\nदोस्तों को जुटाया \nहड्डियों को चूम लेने वाली सर्दियों की रातों में\nघुटने तक पानी मे खड़ा रहा\nन्याय के लिए विवेक भर अड़ा रहा\n(एक गेहूँ उगाने के लिए खोलने पड़ते हैं कितने मोर्चे \nकितना आसान है\nख़ारिज कर देना एक वाक्य में पूरा का पूरा जीवन)\nकिसी की ख़ुशी में शामिल हुआ\nतो भूल गया कि\nसमय का पत्थर बरसाती बिजलियों की तरह\nसीने में चिटकता है इन दिनों\nतुम्हारे जाने के बाद भी हिम्मत भर लड़ा\nऔर थका तो सपने में जाकर रोया\nपर मेरी तुम!\nकाश आज तुम मुझे सुन लेती\nहत्यारों में किया गया हूँ शामिल\nआतताइयों का दोस्त बताकर किया गया है अट्टहास \nपीठ पर बढ़ते जाते हैं अभिव्यक्तियों के घाव\nमैं वहाँ हूँ जहाँ से इंसान का दायाँ हाथ\nअपने ही बाएँ हाथ को पहचानने से इनकार करता है।\nकाश आज तुम मुझे सुन लेतीं\nकाश मैं तुम्हें छू सकता\nजैसे इस दुनिया से बचाती हुई\nअपने सीने में मुझे छिपाती हई\nतुम कह देतीं-\nनहीं, तुम्हारी गर्दन तुम्हारी आवाज़ की क़ीमत नहीं चुकायेगी\nतुम्हारा 'जन्म एक भयंकर हादसा' नहीं था।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}