{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Bas Ek Reteela Sapaat Aur Sookha Nahi hai Wah | Nandkishore Acharya","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/57e9ccd1\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":206,"description":"बस एक रेतीला सपाट है - नंदकिशोर आचार्य\n \nन  ऊँचाइयाँ है, न गहराइयाँ, \nबस एक रेतीला सपाट है\nदूर तक पसरा हुआ निश्छाय तपता जपता नाम कोई\nकहाँ तक उड़ता आबाद बंसल में प्यासा कलपता पाखी\nढूँढ़ता छाया अपने ही परछाई में\nआ गिरता रेत पर बेबस, तड़पता झुलस जाता है\nसपना पल रहा था जो आँखों से निकलकर ढुलकने भी नहीं पाता\nसूख जाता है नि:संघ पसरा हुआ निश्छाय रेतीला सपाट\nतपता रहता है।\nसूखा नहीं है वह\nवे समझते हैं तुम्हारा कोई अतीत नहीं है\nऐसे ही सूखे रहे हो तुम सदा, क्योंकि\nजिनका कोई भी अतीत रहा होता है वे सदा बिसूरते रहते हैं\nहाँ, एक दुख वह भी होता है जो पत्थर कर देता है\nलेकिन अंदर उबलता रहता है चश्मा और एक दिन फोड़कर उसे निकल आता है\nलेकिन तुम तो रेत हो, यानी जो भीतर ही भीतर\nहो सकता वह भी गया होगा सूख\nनहीं सूखा नहीं है वह, नहीं तो यों सँजोए नहीं रहते\nअपनी जर्जर छाती में वे सारे जीवाश्म\nजो कभी दुनिया थी तुम्हारी\nजब तक अपनी दुनिया की यादें दबी है मन में, जीवाश्म सी ही सही\nतब तक दुख है इसलिए सपने भी\nवह जितना गहरा है चश्मा उसी शिद्दत से कभी फूटेगा।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}