{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Aane Walon Se Ek Sawaal | Bharatbhushan Agrawal ","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/5ad2a433\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":181,"description":"आने वालों से एक सवाल - भारतभूषण अग्रवाल\nतुम, जो आज से पूरे सौ वर्ष बाद \nमेरी कविताएँ पढ़ोगे \nतुम मेरी धरती की नई पौध के फूल \nतुम, जिनके लिए मेरा तन-मन खाद बनेगा \nतुम, जब मेरी इन रचनाओं को पढ़ोगे \nतो तुम्हें कैसा लगेगा : \nइस का मेरे मन में बड़ा कौतूहल है। \nबचपन में तुम्हें हिटलर और गांधी की कहानियाँ सुनाई जाएँगी \nउस एक व्यक्ति की \nजिसने अपने देशवासियों को मोह की नींद सुला कर \nसारे संसार में आग लगा दी, \nऔर जब लपटें उसके पास पहुँचीं \nतो जिसने डर कर आत्महत्या कर ली \nताकि उनका मोह न टूटे; \nऔर फिर उस व्यक्ति की \nजिसने अपने देशवासियों को सोते से जगा कर \nसारे संसार को शांति का रास्ता बताया \nऔर जब संसार उसके चरणों पर झुक रहा था \nतब जिसके देशवासी ने ही उसके प्राण ले लिए \nकि कहीं सत्य की प्रतिष्ठा न हो जाए। \nतुम्हें स्कूलों में पढ़ाया जाएगा \nकि सौ वर्ष पहले \nइनसानी ताक़तों के दो बड़े राज्य थे \nजो दोनों शांति चाहते थे \nऔर इसीलिए दोनों दिन-रात युद्ध की तैयारी में लगे रहते थे, \nजो दोनों संसार को सुखी देखना चाहते थे \nइसीलिए सारे संसार पर क़ब्जा करने की सोचते थे; \nऔर यह भी पढ़ाया जाएगा \nकि एक और राज्य था \nजो संसार-भर में शांति का मंत्र फूँकता रहा \nपर जिसे अपने ही घर में \nभाई-भाई के वीच दीवार खड़ी करनी पड़ी \nजो हर पराधीन देश की मुक्ति में लगा रहता था \nपर जिसके अपने ही अंग पराए बंधन में जकड़े रहे। \nतुम्हें विश्वविद्यालयों में बताया जाएगा \nकि इंसान का डर दूर करने के लिए \nसौ साल पहले वैज्ञानिकों ने कुछ ऐसे आविष्कार किए \nजिनसे इंसान का डर और भी बढ़ गया, \nऔर यह भी \nकि उसने चाँद-सितारों में भी पहुँचने के सपने देखे \nजबकि उसके सारे सपने चकनाचूर हो गए थे। \nऔर तभी किसी दिन \nकिसी प्राचीन काव्य-संग्रह में \nतुम मेरी कविताएँ पढ़ोगे; \nऔर उन्हें पढ़ कर तुम्हें कैसा लगेगा \nयह जानने का मेरे मन में बड़ा कौतूहल है। \nतुम जो आज से सौ साल बाद मेरी कविताएँ पढ़ोगे \nतुम क्या यह न जान सकोगे \nकि सौ साल पहले \nजिन्होंने तन्मयता से विभोर होकर \nआत्मा के मुक्त-आरोहण के \nया समवेत जीवन के जय के गीत गाए \nवे आँखें बंद किए सपनों में डूबे थे \nऔर मैं जिसका स्वर सदा दर्द से गीला रहा, \nजिसके भर्राए गले से कुछ चीख़ें ही निकल सकीं \nमैं सारा बल लगा कर \nआँखें खोले \nयथार्थ को देख रहा था। ","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}