{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Main Shamil Hun Ya Na Hun | Nasira Sharma","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/5ce49a83\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":155,"description":"मैं शामिल हूँ या न हूँ |  नासिरा शर्मा \n\nमैं शामिल हूँ या न हूँ मगर हूँ तो\n इस काल- खंड की चश्मदीद गवाह!\nबरसों पहले वह गर्भवती जवान औरत\nगिरी थी, मेरे उपन्यासों के पन्नों पर\nख़ून से लथपथ।\nईरान की थी या फिर टर्की की\nया थी अफ़्रीका की या फ़िलिस्तीन की\nया फिर हिंदुस्तान की\nक्या फ़र्क़ पड़ता है वह कहाँ की थी।\n\nवह लेखिका जो पूरे दिनों से थी\nजो अपने देश के इतिहास को\nशब्दों का जामा पहनाने के जुर्म में\nलगाती रही चक्कर न्यायालय का\nदेती रही सफ़ाई ऐतिहासिक घटनाओं\nकी सच्चाई की,और लौटते हुए\nफ़िक्रमंद रही ,उस बच्चे के लिए\nजो सुन रहा था  किसी अभिमन्यु की तरह\nसारी कारगुज़ारियाँ ।\n\nया फिर वह जो दबा न पाई अपनी आवाज़ और\nचली गई सलाख़ों के पीछे\nगर्भ में पलते हुए एक नए चेहरे के साथ।\nयह तो चंद हक़ीक़तें व फसानें हैं\nजाने कितनों ने, तख़्त पलटे हैं\nहुकमरानों के\nछोड़ कर अपनी जन्नतों की सरहदें ।\n\nचिटख़ा देती हैं कभी अपने वजूद को\nअपनी ही चीत्कारों और सिसकियों से\nतोड़ देतीं हैं उन सारे पैमानों व बोतलों को\nजिस में उतारी गई हैं वह बड़ी महारत से\nदीवानी हो चुकी हैं सब की सब औरतें।\n\nमैं शामिल हूँ या न हूँ,मगर हूँ तो\nइस काल-खंड की चश्मदीद गवाह।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}