{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Prajapati | Rajesh Joshi","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/604b0c73\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":196,"description":"प्रजापति - राजेश जोशी\nचीज़ों का हूबहू दिखना अपनी ही शक्ल में \nकविता में मुझे पसंद नहीं बिल्कुल \nमैं चाहता हूँ मेरा फटा-पुराना जूता भी दिखे वहाँ \nपूर्णिमा के पूरे चाँद की तरह \nएक साबुन की तरह दिखे मेरी आत्मा \nछोटी-छोटी विकृतियाँ और अंतर्विरोध भी दिखें वहाँ \nफूली हुई नसों वाले राक्षसों से इतने वीभत्स और दैत्याकार \nकि आसानी से की जा सके उनसे घृणा \nकी जा सके नफ़रत \nमुझे पसंद हैं वे विदूषक जो मंच पर आने से पहले ही \nरँग लेते हैं अपना पूरा चेहरा \nमैं चाहता हूँ \nबेहद थका और ऊबा हुआ फ़ोरमैन भी जब अपने घर में घुसे \nतो बदल जाए तत्काल उसका चेहरा \nअपनी पाँच बरस की बेटी के पिता की तरह \nबदल जाएँ, बदल जाएँ लोगों के चेहरे \nजब वे मेरी कविता में आएँ \nहीरे की तरह चमकती हुई दिखें लोगों की \nबहुत छोटी-छोटी अच्छाइयाँ \nकि आत्महत्या करता आदमी पलट कर दौड़ पड़े \nजीवन की ओर चिल्लाता हुआ \nकुछ नहीं है जीवन से ज़्यादा सुंदर \nजीवन से ज़्यादा प्यारा \nजीवन की तरह अमर \nमैं चाहता हूँ \nकि कविता के भीतर फैली आसमान की टेबिल पर \nमैं जब सूरज के साथ चाय पी रहा होऊँ \nएक विशाल समुद्र की तरह दिखे \nमेरा कप। ","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}