{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":" Aara Machine | Vishwanath Prasad Tiwari","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/609cb5d2\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":149,"description":"आरा मशीन - विश्वनाथ-प्रसाद-तिवारीचल रही है वहइतने दर्प मेंकि चिनगारियाँ छिटकती हैं उससेदौड़े आ रहे हैंअगल-बगल के यूकिलिप्टसऔर हिमाचल के देवदारुउसके आतंक में खिंचे हुएदूर-दूर अमराइयों मेंपक्षियों का संगीत गायब हो गया हैगुठलियाँ बाँझ हो गई हैंउसकी आवाज सेमेरा छोटा बच्चा देख रहा है उसेकौतुक सेकि कैसे चलती है वहकैसे अपने आप एक लकड़ीदूसरी को ठेलकर आगे निकल जाती हैऔर अपना कलेजा निकालकरसंगमरमर की तरह चमकने लगती हैमेरा बच्चा देख रहा है अचरज सेअपने समय का सबसे बड़ा चमत्कारतेज नुकीले दाँतघूमता हुआ पहिया और पट्टाबच्चा किलकता है ताली बजाकरमैं सिहर जाता हूँअभी वह मेरे सीने से गुजरेगीमेरे भीतर से एक कुर्सी निकालेगीराजा के बैठने के लिएराजा बैठेगा सिंहासन परऔर वन-महोत्सव मनाएगा।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}