{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Phoota Prabhat | Bharat Bhushan Aggarwal","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/62623b2f\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":169,"description":"फूटा प्रभात | भारतभूषण अग्रवाल\n\nफूटा प्रभात, फूटा विहान\nवह चल रश्मि के प्राण, विहग के गान, मधुर निर्भर के स्वर\n\nझर-झर, झर-झर।\nप्राची का अरुणाभ क्षितिज,\n\nमानो अंबर की सरसी में\nफूला कोई रक्तिम गुलाब, रक्तिम सरसिज।\n\nधीरे-धीरे,\nलो, फैल चली आलोक रेख\n\nघुल गया तिमिर, बह गई निशा;\nचहुँ ओर देख,\n\nधुल रही विभा, विमलाभ कांति।\nअब दिशा-दिशा\n\nसस्मित,\nविस्मित,\n\nखुल गए द्वार, हँस रही उषा।\nखुल गए द्वार, दृग खुले कंठ,\n\nखुल गए मुकुल\nशतदल के शीतल कोषों से निकला मधुकर गुँजार लिए\n\nखुल गए बंध, छवि के बंधन।\nजागो जगती के सुप्त बाल!\n\nपलकों की पंखुरियाँ खोलो, खोलो मधुकर के अलस बंध\nदृग् भर\n\nसमेट तो लो यह श्री, यह कांति\nबही आती दिगंत से यह छवि की सरिता अमंद\n\nझर-झर, झर-झर।\nफूटा प्रभात, फूटा विहान,\n\nछूटे दिनकर के शर ज्यों छवि के वहि-बाण\n(केशर-फूलों के प्रखर बाण)\n\nआलोकित जिन से धरा।\nप्रस्फुटित पुष्पों के प्रज्वलित दीप,\n\nलो-भरे सीप।\nफूटी किरणें ज्यों वहि-बाण, ज्यों ज्योति-शल्य,\n\nतरु-वन में जिनसे लगी आग।\nलहरों के गीले गाल, चमकते ज्यों प्रवाल,\n\nअनुराग-लाल।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}