{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Hum Auratein hain Mukhautey Nahi | Anupam Singh","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/637b9a42\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":165,"description":"हम औरतें हैं मुखौटे नहीं - अनुपम सिंह\n\nवह अपनी भट्ठियों में मुखौटे तैयार करता है \nउन पर लेबुल लगाकर सूखने के लिए \nलग्गियों के सहारे टाँग देता है \nसूखने के बाद उनको \nअनेक रासायनिक क्रियाओं से गुज़ारता है \nकभी सबसे तेज़ तापमान पर रखता है \nतो कभी सबसे कम \nऐसा लगातार करने से \nअप्रत्याशित चमक आ जाती है उनमें \nविस्फोटक हथियारों से लैस उनके सिपाही \nघर-घर घूम रहे हैं \nकभी दृश्य तो कभी अदृश्य \nघरों से घसीटते हुए \nउनको अपनी प्रयोगशालाओं की ओर ले जा रहे हैं \nवे चीख़ रही हैं... \nपेट के बल चिल्ला रही हैं \nफिर भी वे ले जाई जा रही हैं \nउनके चेहरों की नाप लेते ख़ुश हैं वे \nकह रहे हैं आपस में \nकि अच्छा हुआ दिमाग़ नहीं बढ़ा इनका \nचेहरे लंबे-गोल, छोटे-बड़े हैं \nलेकिन वे चाहते हैं \nसभी चेहरे एक जैसे हों \nएक साथ मुस्कुराएँ \nऔर सिर्फ़ मुस्कुराएँ \nतो उन्होंने अपनी धारदार आरी से \nउनके चेहरों को सुडौल \nएक आकार का बनाया \nअब वे मुखौटों को चेहरों पर ठोंक रहे हैं... \nवे चिल्ला रही हैं \nहम औरतें हैं! \nसिर्फ़ मुखौटे नहीं! \nवे ठोंके ही जा रहे हैं \nठक-ठक लगातार... \nअब वे सुडौल चेहरों वाली औरतें \nउनकी भट्ठियों से निकली \nप्रयोगशालाओं में शोधित \nआकृतियाँ हैं। ","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}