{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Nritya | Nidhi Sharma","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/64314250\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":144,"description":"नृत्य - निधि शर्मा \n\nमैं नाचती हूं, अपने दुखों के गीत पर।\nमैं मुस्कुराती हूं जब तुम मुझे छोड़ कर चले जाते हो।\nमेरे रोम रोम में बजता है विरह का संगीत।\nऔर उसमे रस घोलती है मेरे प्राणों की बांसुरी।\nहर दफा हर दुख के पश्चात्‌ मैं जन्म लेती हृ।\nपहले से कुछ अलग, पहले से कोमल हृदय और मजबूत भावनाओं के साथ।\n\nदुःख के प्रत्येक क्षण को संजो लेती हूं अपने बालों के जूड़े में\nआंसुओं के मोती टांक देती हूं अपने आंचल में।\n\nऔर छिपा कर रख देती हूं उस चुनर को दुनिया भर की नज़रों से।\nजब दुख मुझे छोड़ कर चला जाता है,\n\nतुम वापस लौट आते हो।\nमैं रोक देती हूं अपने कदम।\nमैं बंद कर देती हूँ अपना नृत्य।\nमेरे भीतर का संगीत भी शांत हो जाता है।\nहृदय कठोर और भावनाएं कमज़ोर पड़ जाती हैं।\nमैं समझ जाती हूं कि मेरी मृत्यु का वक़्त नज़दीक है।\nमैं जानती हूं कि मैं दोबारा जन्म लूंगी।\nदोबारा करूंगी नृत्य।\nसो इस दफा घुंघरुओं को कस लेती हूं और भी अधिक मज़बूती से।\nऔर ओढ़ लेती हूं वो चुनर जिसमें कुछ और मोतियों को टांकने की गुंजाइश अभी\nबाकी है।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}