{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Ja Raha Tha Mendhakon Ka Kafila | Ashok Chakradhar","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/6494cb89\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":315,"description":"जा रहा था मेंढकों का काफ़िला | अशोक चक्रधर\n\nजा रहा था मेंढकों का काफ़िला\nएक कुआँ मार्ग में उनको मिला\nवे लगे कुएँ के अंदर झाँकने\nऔर जल में बिंब अपना ताकने\nकुछ कुदकते थे कुएँ की मेंड़ पर\nकुछ लगे आपस की छेड़मछेड़ पर\nनाचने और कूदने में मस्त थे\nगिर गए उनमें से दो जो स्वस्थ थे\nखिलखिलाकर सभी टर्राने लगे\nजो गिरे थे डर से थर्राने लगे\nथीं निकल आने की उनकी ख़्वाहिशें\nकुआँ गहरा था न थीं गुजाइशें\nसतह चिकनी सीढ़ियाँ भी थीं नहीं\nजो गिरा वो कभी निकला ही नहीं\nकुआँ तत्पर था निगलने के लिए\nव्यग्र थे दोनों निकलने के लिए\nकोशिशें करते थे तेज़ तपाक से\nकिंतु गिर जाते थे वहीं छपाक से\nदृश्य ऊपर का विकट घनघोर था\nमेंढकों का झुंड करता शोर था\nदेख उन दोनों की व्याकुल बेबसी\nऊपर से एक मेंढक ने कुटिल फब्ती कसी–\nअब तुम्हारी कोशिशें सब व्यर्थ हैं\nटाँग लंबी हैं मगर असमर्थ हैं\nकुछ समय बस चित्त को बहलाओगे\nकुंएँ के मेंढक सदा कहलाओगे!\nअगर जीना है तो कोशिश मत करो\nऔर चाहो तो यूँ हीं थककर मरो\nअब हमारा कथन यही परोक्ष है\nआत्महत्या ही तुम्हारा मोक्ष है\nसभी मेंढक मिल के चिल्लाने लगे\nमौत मातम मर्सिया गाने लगे–\nडूब जा, डूब जा डूब जा रे\nदूर हैं ज़िंदगी के किनारे!\nतुम हो मेंढक नहीं तुम हो उल्लू\nडूबने को तो काफ़ी है चुल्लू!\nडूबे क़िस्मत के सारे सितारे!\nडूब जा, डूब जा, डूब जा रे\nदूर हैं ज़िंदगी के किनारे!\nदोनों डूबो जल्दी-जल्दी\nइत्ती देली कैछे कल्दी?\nशोर कुएँ में निराशा भर गया\nएक उनमें से तड़प कर मर गया\nदूसरे ने यत्न पर त्यागा नहीं\nमृत्यु का भय भी उसे लागा नहीं\nहै निकलना मन में इतना ठान कर\nसाँस खींची टाँग लंबी तान कर\nमोड़ कर पंजे झुका घुटनों के बल\nभींच कर मुँह सँजो ली ताकत सकल\nदेह को स्प्रिंग सरीखा कर लिया\nहौसला ख़ुद में लबालब भर लिया\nएक दिव्य छलाँग मारी\nआ गया, आ गया, आ गया, लो आ गया\nजी छा गया \nदे रहे  थे जो अभी तक गालियाँ\nअब बजाने लग गए वे तालियाँ\nसीख जिसने दी सिमट कर रह गया\nकोसने वाला भी कट कर रह गया\nवो उछलना क्या था एक उड़ान थी\nआत्मबल की जागती पहचान थी\nगगन में गूँजा उसी का क़हक़हा\nमेंढकों की भीड़ से उसने कहा–\nहूँ तो बहरा किंतु सबका शुक्रिया\nआपने जो काम ऊपर से किया\nसुन न पाया आपकी मैं टिप्पणी\nपर इशारों से मेरी हिम्मत बनी\nआपके संकेत बाहर लाए हैं\nजानता हूँ कैसे गाने गाएँ हैं\nशीघ्र आता समझ मैं पाता अगर\nलय में हिलते...","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}