{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Aabhaar | Shivmangal Singh Suman","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/665eb216\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":152,"description":"आभार - शिवमंगल सिंह ‘सुमन’जिस जिससे पथ पर स्नेह मिलाउस उस राही को धन्यवाद।जीवन अस्थिर अनजाने हीहो जाता पथ पर मेल कहींसीमित पग-डग, लम्बी मंज़िलतय कर लेना कुछ खेल नहींदाएँ-बाएँ सुख-दुख चलतेसम्मुख चलता पथ का प्रमादजिस जिससे पथ पर स्नेह मिलाउस उस राही को धन्यवाद।साँसों पर अवलम्बित कायाजब चलते-चलते चूर हुईदो स्नेह-शब्द मिल गए, मिलीनव स्फूर्ति थकावट दूर हुईपथ के पहचाने छूट गएपर साथ-साथ चल रही यादजिस जिससे पथ पर स्नेह मिलाउस उस राही को धन्यवाद।जो साथ न मेरा दे पाएउनसे कब सूनी हुई डगरमैं भी न चलूँ यदि तो भी क्याराही मर लेकिन राह अमरइस पथ पर वे ही चलते हैंजो चलने का पा गए स्वादजिस जिससे पथ पर स्नेह मिलाउस उस राही को धन्यवाद।कैसे चल पाता यदि न मिलाहोता मुझको आकुल-अन्तरकैसे चल पाता यदि मिलतेचिर-तृप्ति अमरता-पूर्ण प्रहरआभारी हूँ मैं उन सबकादे गए व्यथा का जो प्रसादजिस जिससे पथ पर स्नेह मिलाउस उस राही को धन्यवाद।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}