{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Zindagi Tere Ghere Mein Rehkar | Sheoraj Singh 'Bechain'","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/68486a9f\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":121,"description":"ज़िन्दगी तेरे घेरे में रहकर - श्योराज सिंह 'बेचैन' ज़िन्दगी तेरे घेरे में रहकर क्या करें इस बसेरे में रहकर इस उजाले में दिखता नहीं  कुछ आँख चुंधियाएँ, पलके भीगी सी रहकरअब कहीं कोई राहत नहीं है दर्द कहता है आँखों से बहकरहाँ, हमी  ने बढ़ावा दिया हैज़ुल्म सहते हैं ख़ामोश रहकरमुक्ति देखी ग़ुलामी से बदतरक्यों चिढ़ाते हैं आज़ाद कहकरघूँट भर पीने लायक न छोड़ी माँ जो आयी हिमालय से बहकरइस नए ट्रैक की ख़ासियत  हैझूट की ट्रैन चलती समय परसच को लेकर ह्रदय में खड़े होक्या करोगे अदालत में कह करउनका मुंसिफ ख़रीदा हुआ हैफैसला भी तो तय सा हुआ हैगर कहोगे कि हम को बचा लोतब तो हमला भी होगा, हमी परज़िन्दगी तेरे घेरे में रहकर क्या करें इस सवेरे में रहकर","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}