{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Udaas Tum | Dharmvir Bharti","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/68992b32\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":186,"description":"उदास तुम - धर्मवीर भारती\n \nतुम कितनी सुंदर लगती हो, जब तुम हो जाती हो उदास! \nज्यों किसी गुलाबी दुनिया में, सूने खंडहर के आस-पास \nमदभरी चाँदनी जगती हो! \nमुँह पर ढक लेती हो आँचल, \nज्यों डूब रहे रवि पर बादल। \nया दिन भर उड़ कर थकी किरन, \nसो जाती हो पाँखें समेट, आँचल में अलस उदासी बन; \nदो भूले-भटके सांध्य विहग \nपुतली में कर लेते निवास। \nतुम कितनी सुंदर लगती हो, जब तुम हो जाती हो उदास! \nखारे आँसू से धुले गाल, \nरूखे हल्के अधखुले बाल, \nबालों में अजब सुनहरापन, \nझरती ज्यों रेशम की किरने संझा की बदरी से छन-छन, \nमिसरी के होंठों पर सूखी, \nकिन अरमानों की विकल प्यास! \nतुम कितनी सुंदर लगती हो, जब तुम हो जाती हो उदास! \nभँवरों की पाँते उतर-उतर \nकानों में झुक कर गुन-गुन कर, \nहैं पूछ रही क्या बात सखी? \nउन्मन पलकों की कोरों में क्यों दबी-ढुकी बरसात सखी? \nचंपई वक्ष को छू कर क्यों \nउड़ जाती केसर की उसाँस! \nतुम कितनी सुंदर लगती हो\nज्यों किसी गुलाबी दुनिया में, सूने खंडहर के आस-पास \nमदभरी चाँदनी जगती हो! \n \n ","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}