{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Yah Main Samajh Nahi Pati | Adiba Khanum","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/68a4a1b1\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":223,"description":" यह मैं समझ नहीं पाती| अदीबा ख़ानमयह मैं समझ नहीं पातीहम आख़िर  किस संकोच से घिर-घिर केपछ्छाड़े खाते हैं।बार-बार भागते हैं अंदर की ओरअंदर जहां सुरक्षा है अपनी ही बनाई दीवारों कीअंदर जहां अंधेरा है.एक सुखद शान्त अंधेरा।वह कौन सी हड़डी हैजो गले में अटकी हैऔरजिसे जब चाहे निकालकर फेंका जा सकता है।लेकिनक्यों इस हड़डी का चुभते रहना हमें आनंद देता है?और आख़िर यही संकोचजिससे मैं जूझती हूं लगातारबार-बारअक्सर अपनों से दूर होकरदुसरे अपनों को अपना न पानाक्या इस शब्द का निचोड़ भर है?या है नाउम्मीदीअपनों के प्रतियह अपना होता क्या है?और पराए की धुनमुझे फिर भी कभी-कभीदूर से सुनाई पड़ती हैये धुन बजती रहती हैपार्श्व में एक गहरी शांति से लबरेज़ये सहारा देती है तबजब उठता है मोहउन लोगों से जिन्हें हम कहते हैंअपनादुनिया कहती है किमोह बहुत अच्छी चीज नहीं हैमैं पूछती हूँ कि मोह बुरी चीज़ क्यों हैजब चाँद के मोह सेखिंच सकते हैं समुद्र मनुष्य और भेड़िएतब अपनों के मोह का निष्कर्ष बुरा क्यों है?मोह सिखाती है धरतीअमोह कौन सिखाता है भला?","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}