{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Mausiyan | Dr Anamika","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/6b961831\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":167,"description":"मौसियाँ | डॉ अनामिका \n\nवे बारिश में धूप की तरह आती हैं— \nथोड़े समय के लिए और अचानक! \nहाथ के बुने स्वेटर, इंद्रधनुष, तिल के लड्डू \nऔर सधोर की साड़ी लेकर \nवे आती हैं झूला झुलाने \nपहली मितली की ख़बर पाकर \nऔर गर्भ सहलाकर \nलेती हैं अंतरिम रपट \nगृहचक्र, बिस्तर और खुदरा उदासियों की! \nझाड़ती हैं जाले, सँभालती हैं बक्से, \nमेहनत से सुलझाती हैं भीतर तक उलझे बाल, \nकर देती हैं चोटी-पाटी \nऔर डाँटती भी जाती हैं कि पगली तू, \nकिस धुन में रहती है जो \nबालों की गाँठे भी तुझसे \nठीक से निकलती नहीं। \nबाल के बहाने वे गाँठे सुलझाती हैं जीवन की! \nकरती हैं परिहास, सुनाती हैं क़िस्से \nऔर फिर हँसती-हँसाती \nदबी-सधी आवाज़ में \nबताती जाती हैं \nचटनी-अचार-मुँगबड़ियाँ और बेस्वाद संबंध \nचटपटा बनाने के गुप्त मसाले और नुस्ख़े— \nसारी उन तकलीफ़ों के जिन पर \nध्यान भी नहीं जाता औरों का। \nआँखों के नीचे धीरे-धीरे \nजिसके पसर जाते हैं साये \nऔर गर्भ से रिसते हैं जो महीनों चुपचाप— \nख़ून से आँसू-से, \nचालीस के आस-पास के अकेलेपन के \nकाले-कत्थई उन चकत्तों का \nमौसियों के वैद्यक में \nएक ही इलाज है— \nहँसी और कालीपूजा और पूरे मोहल्ले की \nअम्मागिरी। \n\nबीसवीं शती की कूड़ागाड़ी \nलेती गई खेत से कोड़कर अपने \nजीवन की कुछ ज़रूरी चीज़ें— \nजैसे मौसीपन, बुआपन, \nचाचीपंथी और अम्मागिरी मग्न \nसारे भुवन की। ","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}