{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Khana Banati Streeyan | Kumar Ambuj","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/6b9ec1ba\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":265,"description":"खाना बनाती स्त्रियाँ | कुमार अम्बुज\nजब वे बुलबुल थीं उन्होंने खाना बनाया\nफिर हिरणी होकर\nफिर फूलों की डाली होकर\nजब नन्ही दूब भी झूम रही थी हवाओं के साथ\nजब सब तरफ़ फैली हुई थी कुनकुनी धूप\nउन्होंने अपने सपनों को गूँधा\nहृदयाकाश के तारे तोड़कर डाले\nभीतर की कलियों का रस मिलाया\nलेकिन आख़िर में उन्हें सुनाई दी थाली फेंकने की आवाज़\nआपने उन्हें सुंदर कहा तो उन्होंने खाना बनाया\nऔर डायन कहा तब भी\nउन्होंने बच्चे को गर्भ में रखकर खाना बनाया\nफिर बच्चे को गोद में लेकर\nउन्होंने अपने सपनों के ठीक बीच में खाना बनाया\nतुम्हारे सपनों में भी वे बनाती रहीं खाना\nपहले तन्वंगी थीं तो खाना बनाया\nफिर बेडौल होकर\nवे समुद्रों से नहाकर लौटीं तो खाना बनाया\nसितारों को छूकर आईं तब भी\nउन्होंने कई बार सिर्फ़ एक आलू एक प्याज़ से खाना बनाया\nऔर कितनी ही बार सिर्फ़ अपने सब्र से\nदुखती कमर में चढ़ते बुख़ार में\nबाहर के तूफ़ान में\nभीतर की बाढ़ में उन्होंने खाना बनाया\nफिर वात्सल्य में भरकर\nउन्होंने उमगकर खाना बनाया\nआपने उनसे आधी रात में खाना बनवाया\nबीस आदमियों का खाना बनवाया\nज्ञात-अज्ञात स्त्रियों का उदाहरण\nपेश करते हुए खाना बनवाया\nकई बार आँखें दिखाकर\nकई बार लात लगाकर\nऔर फिर स्त्रियोचित ठहराकर\nआप चीख़े—उफ़, इतना नमक\nऔर भूल गए उन आँसुओं को\nजो ज़मीन पर गिरने से पहले\nगिरते रहे तश्तरियों में, कटोरियों में\nकभी उनका पूरा सप्ताह इस ख़ुशी में गुज़र गया\nकि पिछले बुधवार बिना चीख़े-चिल्लाए\nखा लिया गया था खाना\nकि परसों दो बार वाह-वाह मिली\nउस अतिथि का शुक्रिया\nजिसने भरपेट खाया और धन्यवाद दिया\nऔर उसका भी जिसने अभिनय के साथ ही सही\nहाथ में कौर लेते ही तारीफ़ की\nवे क्लर्क हुईं, अफ़सर हुईं\nउन्होंने फर्राटेदार दौड़ लगाई और सितार बजाया\nलेकिन हर बार उनके सामने रख दी गई एक ही कसौटी\nअब वे थकान की चट्टान पर पीस रही हैं चटनी\nरात की चढ़ाई पर बेल रही हैं रोटियाँ\nउनके गले से, पीठ से\nउनके अँधेरों से रिस रहा है पसीना\nरेले बह निकले हैं पिंडलियों तक\nऔर वे कह रही हैं यह रोटी लो\nयह गरम है\nउन्हें सुबह की नींद में खाना बनाना पड़ा\nफिर दुपहर की नींद में\nफिर रात की नींद में\nऔर फिर नींद की नींद में उन्होंने खाना बनाया\nउनके तलुओं में जमा हो गया है ख़ून\nझुकने लगी है रीढ़\nघुटनों पर दस्तक दे रहा है गठिया\nआपने शायद ध्यान नहीं दिया है\nपिछले कई दिनों से...","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}