{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Doosre Log | Manglesh Dabral","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/71c8bbe0\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":196,"description":"दूसरे लोग | मंगलेश डबराल \n\nदूसरे लोग भी पेड़ों और बादलों से प्यार करते हैं\nवे भी चाहते हैं कि रात में फूल न तोड़े जाएँ\nउन्हें भी नहाना पसन्द है एक नदी उन्हें सुन्दर लगती है\nदूसरे लोग भी मानवीय साँचों में ढले हैं\nथके-मांदे वे शाम को घर लौटना चाहते हैं।\nजो तुम्हारी तरह नहीं रहते वे भी रहते हैं यहाँ अपनी तरह से\nयह प्राचीन नगर जिसकी महिमा का तुम बखान करते हो  \nसिर्फ़ धूल और पत्थरों का पर्दा है\nऔर भूरी पपड़ी की तरह दिखता यह सिंहासन\nजिस पर बैठकर न्याय किए गए\nइसी के नीचे यहाँ हुए अन्याय भी दबे हैं\nसभ्यता का गुणगान करनेवालो\nतुम अगर सध्य नहीं हो\nतो तुम्हारी सभ्यता का क़द तुमसे बड़ा नहीं है।\nएक लम्बी शर्म से ज़्यादा कुछ नहीं है इतिहास\nआग लगानेवालो\nइससे दूसरों के घर मत जलाओ\nआग मनुष्य की सबसे पुरानी अच्छाई है\nयह आत्मा में निवास करती है और हमारा भोजन पकाती है\nअत्याचारियो\nतुम्हें अत्याचार करते हुए बहुत दिन हो गए\nजगह-जगह पोस्टरों अख़बारों में छपे तुम्हारे चेहरे कितने विकृत हैं\nतुम्हारे मुख से निकल रहा है झाग\nआर तुम जो कुछ कहते हो उससे लगता है\nअभी नष्ट होनेवाला है बचाखुचा हमारा संसार।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}