{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Thand Mein Gauraiyya | Kedarnath Singh","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/775270b5\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":164,"description":"ठंड में गौरैया | केदारनाथ सिंह\n\nठंड पर लिखी जाने वाली इस कविता में \nयह गौरैया कहाँ से आ गई सबसे पहले?\n\nभला वह क्यों नहीं \nजो चला जा रहा है सड़क पर \nअपने कोट का कॉलर ठीक करता हुआ? \nक्यों नहीं वह स्त्री \nजो तार पर जल्दी-जल्दी फैला रही है \nअपने स्वेटर? \nवह धुनिया क्यों नहीं \nजो चला जा रहा है गली में रुई के रेशों को\nआवाज़ देता हुआ?\n\nक्यों आख़िर क्यों \nकविता के शुरू में वही गौरैया \nछज्जे पर बैठी हुई \nजिसे बरसों पहले मैंने कहाँ देखा था \nयाद नहीं\n\nमौसम की पहली सिहरन! \nऔर देखता हूँ\n\nअस्त-व्यस्त हो गया है सारा शहर \nऔर सिर्फ़ वह गौरैया है जो मेरी भाषा की स्मृति में \nवहाँ ठीक उसी तरह बैठी है \nऔर ख़ूब चहचहा रही है \nवह चहचहा रही है \nक्योंकि वह ठंड को जानती है \nजैसे जानती है वह \nअपनी गर्दन के पास भूरे-भूरे रोओं को \nवह जानती है कि वह जिस तरफ़ जाएगी \nउसी तरफ़ उड़कर चली जाएगी ठंड भी \nक्योंकि ठंड और गौरैया दोनों का \nबहुत कुछ है \nबहुत कुछ साझा और बेहद मूल्यवान \nजो इस समय लगा है \nदाँव पर...","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}