{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Gori Soyi Sej Par | Madan Kashyap","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/78fcc784\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":358,"description":"गोरी सोयी सेज पर । मदन कश्यप\n\nशब्द जो नंदिनी के खुर के नीचे दब कर भी नहीं मरे, राजा दिलीप के आतंक से मर गये कालिदास से पूछो कि धमनियों का रक्त पिला-पिला कर कैसे पुनरुज्जीवित किया उन शब्दों को\n\nमैं एक ऐसे टीले पर चक्कर काट रहा हूँ\nजिसके नीचे एक सभ्यता ही नहीं एक भाषा भी दफ्न है\nमुझे ढूँढने हैं हजारों शब्द\nजो कहीं उतनी छोटी-सी जगह में दुबके हैं जितनी-सी जगह\nतुम्हारे नाखून और उस पर चढ़ी पालिश के बीच बची होती है\n\nतुम्हारे दुपट्टे को लहराने वाली हवा ने ही\nउन नावों के पालों को लहराया था\nजिन पर पहली बार लदे थे हड़प्पा के मृदभाँड\n\nइतिहास की अजस्त्र धारा पर अध्यारोपित तुम्हारी हँसी\nकाल की सहस्त्र भंगिमाओं का मोंताज तुम्हारा चेहरा\n\nसबसे लंबे समयखंड को\nअपनी नन्हीं भुजाओं में समेट लेने को आतुर मेरा मन\nतुम्हें ढूंढता रहता है अक्षरों से भी पुराने गुफाचित्रों में\n\nमुझे याद आ रहे हैं अमीर खुसरो\nसुनो वे तब भी याद आए थे\nजब पहली और आखिरी बार मैंने तुम्हारे होंठों को चूमा था\nवह एक यात्रा थी एक भय से दूसरे भय में\nऔर इस तरह भय का बदल जाना भी कम भयानक नहीं होता\n\n‘गोरी सोयी सेज पर, मुख पर डारे केस\nचल खुसरो घर आपने, रैन भयी चहुं देस’\n\nछह सौ बहत्तर वर्षों में भी जब तुम्हारे मुख पर से केश हटा नहीं सका\nतब जाकर एहसास हुआ कि यह रैन इतनी लंबी है\nसुबह तो उस रात की होती है जो सूरज के डूबने से हुई हो\n\nजिसे रच रहे थे अमीर खुसरो\nकुछ शब्द गुम हो गए उस भाषा के\nऔर कुछ आततायी व्याकरण की जंग लगी बेड़ियों में कैद हो गए\n\nएकल कोशिकीय अनुजीवों के जगल से गुजरते हुए\nमुझे पहुंचना है उस पनघट पर\nजहां स्वच्छ जामुनी जल की तरह तरल शब्द कर रहे हैं मेरी प्रतीक्षा\n\nमैं धीरे-धीरे एक विषाल स्पाइरोगाइरा में बदलते जा रहे\nइस महादेश के जेहन में अपनी कविता के साथ जाना चाहता हूँ\nअंधेरी सुरंगों में सपनों के कुछ गहरे रंग भरना चाहता हूँ\n\nएक शून्य जो पसरता जा रहा है हमारे चारों ओर\nमैं उसे पाटना चाहता हूँ\nकविता की आँखों में तैर रहे नये छंदों से\n\nमैं भाषा के समुद्र का सिंदबाद\nअपने पास रखना चाहता हूं केवल यात्राओं की पीड़ा\nबाकी सबकुछ तुम्हें दे देना चाहता हूँ\nतुम्हें दे देना चाहता हूँ\nअपने अच्छे दिनों में संचित सारे शब्द\nअपनी बोली की तमाम महाप्राण ध्वनियाँ\n\nमैं चाँद के रैकेट से सारे सितारों को उछाल देना चाहता हूं तुम्हारी ओर!","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}