{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Shraadh | Ashutosh Sharma","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/79698ac5\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":181,"description":"श्राद्ध - आशुतोष शर्मा \n\nकिसी चींटी को बचपन में कुचला था\nकेंचुए को बीच से काट दिया था मेरा जूता\nछत से मारे थे चप्पल किसी भिखारी को\nकिसी को कुलटा तो किसी को कहा वेश्या\nझूलों पे बन बैठा कभी तानाशाह\nउपेक्षकों की सामूहिकता में रहा कभी शामिल\nबहनों के बस्तों में भर दी छिपकलियां\nमारे थे कंकड़ कभी मां के एड़ी पर\nपत्थर से उजाड़ दिया किसी बुलबुल का आशियाना\n\nअग्नि नहीं जला सकता मेरा अधर्म\nगंगाजल को सोख जाएगा मेरा कोढ़\nपीले पड़ जायेंगे मेरे मुख में वृन्दापर्ण\nसंस्कारच्युत शवों की भांति भटक रहा है मेरा पाप\nमृत्यु पर सिरहाने मेरे\nपंजे जूते चप्पल\nककड़ पत्थर और छिपकलियां थी\nकिन्तु मेरे श्राद्ध में नदारद थे\nचींटी बुलबुल केंचुए \nभिखारी बस्ते उपेक्षित और झूले\nकुलटाएं वेश्याएं बहनें व माताएं\nकिसी शास्त्रीय वर्जना के कारण\nजीते जी नहीं आ सकते शमशान\nउनके मृत्यु की प्रतीक्षा के एक और स्वार्थी पाप का बोझ\nनहीं उठा सकती मेरी आत्मा।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}