{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Jab Rangon Ki Baat Chalti Hai | Shahanshah Alam","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/799099fd\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":204,"description":"जब रंगों की बात चलती है  - शहंशाह आलम\n \nजब रंगों की बात चलती है\nबहुत बुरे रंग में भी तुम ख़ास कुछ\nढूंढ़ लेती हो\nतुमने बतलाया कि ऎसा हमारे\nप्रेम की वज़ह से होता है\nमैं तुम्हारी पसन्द के रंगों वाले\nकपड़े और जूते पहन कर\nकुमार गंधर्व के आडियो कैसेट खरीदने\nइतवार की शाम को निकलता हूँ घर से\nमैं जहाँ पर काम करता हूँ\nवहाँ ऎसे रास्ते होकर पहुँचता हूँ\nजिस रास्ते में\nतुम्हारी पसन्द के रंग दिखते हैं\nऔर जिस रास्ते के लोग\nअच्छे रंगों के मुंतज़िर रहते हैं हमेशा\nमैं जिस किराए के मकान में रहता हूँ\nउसमें सिर्फ़ एक कील ठोकने की इजाज़त है\nमैंने इस एक कील पर तुम्हारी तस्वीर टांग दी है\nतुम यही चाहती थीं\nजबकि तुमने मेरी तस्वीर रखने से\nसाफ़ इंकार कर दिया था\nजितनी हवाएँ और दूसरी चीज़ें\nजीने के लिए ज़रूरी होती हैं\nतुम्हारे लिए तुम्हारी पसंद के रंग भी\nज़रुरी हो गए हैं\nबरसात के दिनों में हम दूर-दराज़ के\nइलाक़े साथ-साथ घूमे थे\nकश्तियों का सफ़र किया था\nरथ पर बैठने से तुम डरती थीं\nमैं चाकू से डरता था\nअब मुझे चाकू से डर नहीं लगता\nइसलिए कि\nअपनी पसंद के रंगों को बचाए रखने के लिए\nआदमी को चाकू से नहीं डरना चाहिए","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}