{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Lauta Main Is bade Sheher Me | Manglesh Dabral","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/79e2c7f2\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":154,"description":"लौटा मैं इस बड़े शहर में | मंगलेश डबरालइस बड़े शहर में रहता मैं एक आदमी अदना-सा था उस छोटे क़स्बे में गया तो पाया मेरा क़द बहुत बड़ा थासभी देखते नज़र उठाकर मुझको किसी बड़ी-सी आशा में मैं भी पता नहीं क्या बोला उनसे भीषण भरकम भाषा मेंवाह वाह कर सुनते थे मेरी कविता कहते थोड़ी और पीजिए बड़े शहर में जब हम आएँ कृपया थोड़ा समय दीजिएमार्ग दिखाते रहें कहा उन्होंने नतमस्तक हो विदा समय चला वहाँ से मैं शर्मिन्दा लगा मुझे खुद से ही भयफिर गया गाँव अपने तो देखा मुझसे लोग ज़रा सहमते थेकैसा दुर्भाग्य मुझे वेसबसे बड़ा मनुष्य समझते थेतुम तो बड़े-बड़ों के संगखाते-पीते खू़ब मजे़ से रहते होगेइतनी अकल कमा ली तुमने हमें याद क्यों करते होगे बीस मिले बेरोज़गार कि छोटा-मोटाकाम कहीं दिलवाओदस वृद्धों ने कहा कि बेटाताक़त की बढ़िया दवा भिजवाओजल्दी ही कुछ करने अगली बार दवा लाने का आश्वासन देकर लौटा मैं इस बड़े शहर मेंफिर से नीचा करने सिर।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}