{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Chinta | Priyadarshan ","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/79fc41d1\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":181,"description":"चिंताएँ कभी खत्म नहीं होतीं\nनींद में भी घुसपैठ कर जाती हैं\nधूसर सपनों वाले कपड़े पहनकर\nजागते समय साथ-साथ चला करती हैं\nकभी-कभी उनके दबाव कुछ कम हो जाते हैं\nतब फैला-फैला लगता है आकाश, प्यारी प्यारी लगती है धूप\nनरम मुलायम लगती है धरती\nलेकिन जब कभी बढ़ जाती हैं चिंताएँ\nबाकी कुछ जैसे सिकुड़ जाता है \nहवा भी भारी हो जाती है\nसाँस लेने में लगती है मेहनत\nएक एक कदम बढ़ाना पहाड़ चढ़ने के बराबर मालूम होता है\nकहाँ से पैदा होती है चिंता?\nक्या हमारे भीतर बसे आदिम डर से?\nया हमारे बाहर बसे आधुनिक समय से?\nया हमारे चारों ओर पसरे इस दुनिया से\nजो दरअसल बनने-टूटने कितने खत्म होने वाले सिलसिले का नाम है\nया निजी उलझनों के जाल से या बाहरी जंजाल से\nहमारे स्वभाव से या दूसरों के प्रभाव से?\nकभी कभी ऐसे भी वक्त आते हैं\nजब बिल्कुल चिंतामुक्त होता है आदमी\nएक तरह के सूफियाना आत्मविश्वास से भरा हुआ\nकि जो भी होगा निबट लेंगे\nएक तरह की अलमस्त फक्कड़ता से लैस\nकि ऐसी कौन सी चिंता है जो जिंदगी से बड़ी है\nकभी इस दार्शनिक खयाल को जीता हुआ\nकि चिंता है तो जिंदगी है\nलेकिन जिंदगी है इसलिए चिंता जाती नहीं\nकुछ न हो तो इस बात की शुरू हो जाती है\nकि पता नहीं कब तक बचा रहेगा चिंतामुक्त समय\nबस इतनी सी बात समझ में आती है\nआदमी है तो इसलिए चिंता है।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}