{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Prem Ke Prasthan | Anupam Singh","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/7b75820a\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":223,"description":"प्रेम के प्रस्थान | अनुपम सिंह \n\nसुनो,\nएक दिन बन्द कमरे से निकलकर हम दोनों\nपहाड़ों की ओर चलेंगे\nया फिर नदियों की ओर\nनदी के किनारे,\nजहाँ सरपतों के सफ़ेद फूल खिले हैं।\nया पहाड़ पर\nजहाँ सफ़ेद बर्फ़ उज्ज्वल हँसी-सी जमी है\nदरारों में और शिखरों पर\nकाढेंगे एक दुसरे की पीठ पर रात का गाढ़ा फूल\nइस बार मैं नहीं\nतुम मेरे बाजुओं पर रखना अपना सिर\nमैं तुम्हें दूँगी उत्तेजित करने वाला चुम्बन\nधीरे-धीरे पहाड़ की बर्फ़ पिघलाकर जब लौट रहे होंगे हम\nतब रेगिस्तानों तक पहुँच चुका होगा पानी\nसुनो,\nइस बार की अमावस्या में हम\nएक दूसरे की आँखों में देर तक देखेंगे अपना चेहरा\nऔर इस कमरे से निकलकर खेतों की ओर चलेंगे\nहमें कोई नहीं देखेगा अंधेरी रात में\nहाथ पकड़कर दूर तक चलते हुए\n\nमैं धान के फूलों के बीच तुम्हें चूमँगी\nझिर-झिर बरसते पानी के साथ\nफैल जाएगा हमारा तत्त्व खेतों में\nमुझे मेरे भीतर\nएक आदिम स्त्री की गंध आती है।\nऔर मैं तुम्हें\nएक आदिम पुरुष की तरह पाना चाहती हूँ\nफिर अगली के अगली बार\nहम पठारों की तरफ चलेंगे\nछोटी-छोटी गठीली वनस्पतियों के बीच गाएँगे कोई पुराना गीत\nजिसे मेरी और तुम्हारी दादी गाती थीं\nखोजेंगे नष्ट होते बीजों को चींटों के बिलों में\nमैं भी गोड़ना चाहती हूँ\nवहाँ की सख्त मिट्टी\nमैं भी चाहती हूँ लगाना\nपठारी धरती पर एक पेड़\nसुनो,\nतुम इस बर लौटो\nतो हम अपने प्रेम के तरीक़े बदल देंगे।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}