{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Pani Aur Dhoop | Subhadra Kumari Chauhan","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/7d4e4fe2\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":175,"description":"पानी और धूप । सुभद्राकुमारी चौहानअभी अभी थी धूप, बरसनेलगा कहाँ से यह पानीकिसने फोड़ घड़े बादल केकी है इतनी शैतानी।सूरज ने क्‍यों बंद कर लियाअपने घर का दरवाजा़उसकी माँ ने भी क्‍या उसकोबुला लिया कहकर आजा।ज़ोर-ज़ोर से गरज रहे हैंबादल हैं किसके काकाकिसको डाँट रहे हैं, किसनेकहना नहीं सुना माँ का।बिजली के आँगन में अम्‍माँचलती है कितनी तलवारकैसी चमक रही है फिर भीक्‍यों खाली जाते हैं वार।क्‍या अब तक तलवार चलानामाँ वे सीख नहीं पाएइसीलिए क्‍या आज सीखनेआसमान पर हैं आए।एक बार भी माँ यदि मुझकोबिजली के घर जाने दोउसके बच्‍चों को तलवारचलाना सिखला आने दो।खुश होकर तब बिजली देगीमुझे चमकती सी तलवारतब माँ कर न कोई सकेगाअपने ऊपर अत्‍याचार।पुलिसमैन अपने काका कोफिर न पकड़ने आएँगेदेखेंगे तलवार दूर से हीवे सब डर जाएँगे।अगर चाहती हो माँ काकाजाएँ अब न जेलखानातो फिर बिजली के घर मुझकोतुम जल्‍दी से पहुँचाना।काका जेल न जाएँगे अबतूझे मँगा दूँगी तलवारपर बिजली के घर जाने काअब मत करना कभी विचार।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}