{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Jab Dost Ke Pita Marey | Kumar Ambuj","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/82f13fab\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":160,"description":"जब दोस्त के पिता मरे | कुमार अम्बुज\n\nबारिश हो रही थी जब दोस्त के पिता मरे\nभीगते हुए निकली शवयात्रा\nबारिश की वजह से नहीं आए ज़्यादा लोग\nजो कंधा दे रहे थे वे एक तरफ़ से भीग रहे थे कम\nसबसे पहले बारिश होती थी दोस्त के पिता के शव पर\nदोस्त चल रहा था आगे-आगे\nनिरीह बेहोशी से भरी डगमगाती हुई थी उसकी चाल\nशमशान में पहुँचकर लगा बारिश में बुझ जाएगी आग\nकई पुराने लोग थे वहाँ जो कह रहे थे\nनहीं बुझेगी चिता\nहम सबने देखा बारिश में दहक रही थी चिता\nलौटने में तितर-बितर\nहुए लोग\nदोस्त के कंधे पर हाथ रखे हुए लौटा मैं\nमुझे नहीं समझ आया क्या कहूँ  मैं उससे\nमुझे तो यह नहीं पता कि कैसा लगता है जब मरते हैं पिता\nअब जब मर गए दोस्त के पिता तो क्या कहूँ उससे\nकि बारिश में हिचकी लेता हुआ उसका गीला शरीर न काँपे\nकौन-सा एक शब्द कहूँ उससे सांत्वना का आखिर\nयही सोचता रहा देर तक\nरात को जब घर लौटकर आया\nबारिश उसी तरह हो रही थी लगातार।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}