{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Rohit Vemula Par Paanch Kavitayein | Priyadarshan","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/831a87e7\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":325,"description":"रोहित वेमुला पर पाँच कविताएँ / प्रियदर्शन \n\nसत्ताईस साल से मौत की तिल-तिल अदा की जा रही किस्तें\nउसने एक बार चुकाने का फैसला किया\nऔर एक लंबी छलाँग लगाकर चला गया\nउस बेहद लंबी अंधी सुरंग के पार जो उसकी जिंदगी थी\nउसकी लहू-लुहान पीठ पर सदियों से पड़ते कोड़ों के निशान थे\nउसकी जुबान सिल दी गई थी\nअपने जख्मी होठों से जिन शब्दों को\nवह अपने मुक्ति के मंत्र की तरह बुदबुदाना चाहता था\nउन्हें व्यर्थ बना दिया गया था\nउसे दंडित किया गया क्योंकि उसने ऊपर उठने की कोशिश की\nवह रामायण का शंबूक था, रोम का स्पार्टाकस\nवह उन लाखों लाख गुमनाम गुलामों दासों और शूद्रों की साझा चीख था\nजो पीटे गए, मारे गए, सूली पर चढ़ा दिए गए\nजिनके कानों में सीसा डाला गया, जिनकी आँख निकाल ली गई\nजिनके शव सड़ने के लिए छोड़ दिए गए सड़कों पर\nवो हमारी आत्मा में चुभता हुआ भारत था\nजिसे खत्म किया जाना जरूरी था\nइतिहास की ताकतें चुपके से तैयार कर रही थीं उसका फंदा\nजब वह मारा गया तो बताया गया कि वह एक कायर था, उसने जान दे दी।’ \n\nदो–\n‘उसकी माँ थी, उसके भाई थे, उसके दोस्त थे, उसके सपने थे, उसका कार्ल सागान था\nउसके भीतर छटपटाती कविताएँ थीं\nउसके भीतर आकार लेती कुछ विज्ञान कथाएँ थीं\nउसके भीतर उम्मीद थी, उसके भीतर गुस्सा था\nउसके भीतर प्रतिरोध की कामना थी\nलेकिन अपने अंतिम समय में वह बिल्कुल खाली था\nवह कौन सा ड्रैक्युला था जिसने उसके भीतर\nउतरकर सोख लिया था उसका पूरा संसार।’ \nतीन–\n‘उसने अपने खुदकुशी के लिए सिर्फ खुद को\nजिम्मेदार ठहराया किसी और को नहीं\nअब उसके हत्यारे उसका दिया प्रमाण-पत्र दिखाकर\nसाबित कर रहे हैं कि उन्होंने उसे नहीं मारा\nवह बस अपना जीवन जीना चाहता था\nलेकिन इतने भर के लिए\nउसे इतिहास की उन ताकतों से टकराना पड़ा\nजो थकाकर मार डालने का हुनर जानती थी\nवे किसी कृपा की तरह वज़ीफ़े बाँटती थीं\nउनके पास बहुत सारा सब्र था, बहुत सारी करुणा\nजिससे वह अपने भीतर की घृणा को छुपाए रखती थीं\nउस दिन के इंतजार में\nजब कोई रोहित वेमुला हार मानकर छोड़ देगा अपनी और उनकी दुनिया\nवे नहीं चाहती थीं कोई उन्हें आईना दिखाए\nकोई याद दिलाए उन्हें उनका ओछापन।’\n\nचार–\n\n‘हमें तो उसका शोक मनाने का हक भी नहीं\nहम तो उसे ठीक से जानते तक नहीं\nहमने कभी उसे देखा तक नहीं कि किस हाल में वह जीता था/किस तरह मरता था, क्यों लड़ता था\nजब उसे इंतजार था हमारा तो हम दूर...","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}