{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Jeb Mein Sirf Do Rupaye | Kumar Ambuj","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/848b9ace\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":133,"description":"जेब में सिर्फ़ दो रुपये - कुमार अम्बुज \n\nघर से दूर निकल आने के बाद \nअचानक आया याद \nकि जेब में हैं सिर्फ दो रुपये \nसिर्फ़ दो रुपये  होने की असहायता ने घेर लिया मुझे \nडर गया मैं इतना कि हो गया सड़क से एक किनारे\n एक व्यापारिक शहर के बीचोबीच \nखड़े होकर यह जानना कितना भयावह है \nकि जेब में है कुल दो रुपये\nआस पास से जा रहे थे सैकड़ों लोग\n उनमें से एक-दो ने तो किया मुझे नमस्कार भी \n जिससे और ज़्यादा डरा मैं \n उन्हें शायद नहीं था मालूम कि जिससे किया उन्होंने नमस्कार\n उसके पास हैं सिर्फ़  दो रुपये \nमहज़ दो रुपए होने की निरीहता बना देती है निर्बल  \n\nजब चारों तरफ़ दिख रहा हो ऐश्वर्य \nजब चारों तरफ़ से पड़ रही हो मार, \nतब निहत्था हो जाना है ज़िन्दगी के उस वक़्त में \nजब जेब में हों केवल दो रुपये \nफिर उनका तो क्या कहें इस संसार में \nजिनकी जेब में नहीं हैं दो रुपये भी ।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}