{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Maine Aahuti Bankar Dekha | Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/8636b925\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":201,"description":" मैंने आहुति बन कर देखा - सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने,मैं कब कहता हूँ जीवन-मरू नंदन-कानन का फूल बने?काँटा कठोर है, तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है,मैं कब कहता हूँ वह घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने?मैं कब कहता हूँ मुझे युद्ध में कहीं न तीखी चोट मिले?मैं कब कहता हूँ प्यार करूँ तो मुझे प्राप्ति की ओट मिले?मैं कब कहता हूँ विजय करूँ मेरा ऊँचा प्रासाद बने?या पात्र जगत की श्रद्धा की मेरी धुंधली-सी याद बने?पथ मेरा रहे प्रशस्त सदा क्यों विकल करे यह चाह मुझे?नेतृत्व न मेरा छिन जावे क्यों इसकी हो परवाह मुझे?मैं प्रस्तुत हूँ चाहे मेरी मिट्टी जनपद की धूल बने-फिर उस धूली का कण-कण भी मेरा गति-रोधक शूल बने!अपने जीवन का रस देकर जिसको यत्नों से पाला है-क्या वह केवल अवसाद-मलिन झरते आँसू की माला है?वे रोगी होंगे प्रेम जिन्हें अनुभव-रस का कटु प्याला है-वे मुर्दे होंगे प्रेम जिन्हें सम्मोहन कारी हाला हैमैंने विदग्ध हो जान लिया, अन्तिम रहस्य पहचान लिया-मैंने आहुति बन कर देखा यह प्रेम यज्ञ की ज्वाला है!मैं कहता हूँ, मैं बढ़ता हूँ, मैं नभ की चोटी चढ़ता हूँकुचला जाकर भी धूली-सा आंधी सा और उमड़ता हूँमेरा जीवन ललकार बने, असफलता ही असि-धार बनेइस निर्मम रण में पग-पग का रुकना ही मेरा वार बने!भव सारा तुझपर है स्वाहा सब कुछ तप कर अंगार बने-तेरी पुकार सा दुर्निवार मेरा यह नीरव प्यार बने।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}