{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Meera Majumdar Ka Kehna Hai | Kumar Vikal","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/8640e256\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":187,"description":"मीरा मजूमदार का कहना है | कुमार विकल\n\nसामने क्वार्टरों में जो एक बत्ती टिमटिमाती है\nवह मेरा घर है\nइस समय रात के बारह बज चुके हैं\nमैं मीरा मजूमदार के साथ\nमार्क्सवाद पर एक शराबी बहस करके लौटा हूँ\nऔर जहाँ से एक औरत के खाँसने की आवाज़ आ रही है\nवह मेरा घर है\nमीरा मजूमदार का कहना है\nकि इन्क़लाब के रास्ते पर एक बाधा मेरा घर है\nजिसमें खाँसती हुई एक बत्ती है\nकाँपता हुआ एक डर है\nइन्क़लाब मीरा की सबसे बड़ी हसरत है\nलेकिन उसे अँधेरे क्वार्टरों\nखाँसती हुई बत्तियों से बहुत नफ़रत है\nवह ख़ुद खनकती हुई एक हँसी है\nजो रोशनी की एक नदी की तरह बहती है\nलेकिन अपने आपको\nगुरिल्ला नदी कहती है\nमीरा मजूमदार इन्क़लाबी दस्तावेज़ है\nपार्टी की मीटिंग का नया गोलमेज़ है\nमीरा मजूमदार एक क्रांतिकारी कविता है\nअँधेरे समय की सुलगती हुई सविता है\nउसकी हँसी में एक जनवादी आग है\nजिससे इन्क़लाबी अपनी सिगरेटें सुल्गाते हैं\nइन्क़लाब के रास्ते को रोशन बनाते हैं\nमैंने भी आज उसकी जनवादी आग से\nअधजले सिगरेट का एक टुकड़ा जलाया था\nऔर जैसे ही मैंने उसे उँगलियों में दबाया था\nझट से मुझे अपना क्वार्टर याद आया था\nमीरा मजूमदार तब—\nमुझको समझाती है.\nमेरे विचारों में बुनियादी भटकाव है\nकथनी और करनी का गहरा अलगाव है\nमेरी आँखों में जो एक बत्ती टिमटिमाती है\nमेरी क्रांति—दृष्टि को वह धुँधला बनाती है\nऔर जब भी मेरे सामने\nकोई ऐसी स्थिति आती है—\nएक तरफ़ क्रांति है और एक तरफ़ क्वार्टर है\nमेरी नज़र सहसा क्वार्टर की ओर जाती है","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}