{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Devi Banne Ki Raah Mein | Priya Johri 'Muktipriya'","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/86ad76b8\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":177,"description":"देवी बनने की राह में  | प्रिया जोहरी 'मुक्ति प्रिया'देवी बनने की राह मेंलंबा सफ़र तय किया हमनेकई भूमिकाऐँ बदलीआंसू की बूंदो का स्वाद चखाखून बहायाकटा चीरा ख़ुद कोअपमान के साथझेली कई यातनाएँहमने छोड़ा अपना घरपुराने खिलौंनेअपनी प्रिय सखीअपना शहरहमने छोड़ दिया अपने सपनों कोऔर छोटी-छोटी आशाओं कोनहीं देखा कभी खुल करशहर कोनहीं जान पाए हमखुद की मर्ज़ी से जीनाकैसा होता हैरात में सड़कों पर चलता हुआशहर कैसा दिखता है।वह जगह कैसी होती है।जहाँ पर केवल देव जा सकते हैकैसे होते हैं वहस्थान जहाँ पर अजनबी चलते है।नहीं पता हमें कैसे दिखती हैंउसकी ज़मीन और आसमानहमने नहीं तोड़ी घर की दीवारेंजो हमें रोकती थीबल्कि बनाए घरसजाया घर घरौंदामिट्टी से लिपाचूल्हा चौकापकाएँ खूब पकवानकर के अपनीखुशियों कोदरकिनार,निभाया अपना देवी धर्महमने जानना छोड़ दियाहमें क्या पसंद है।हम बस चलते गएऔर सीखते गएअच्छी देवी बनने का सबक हमने मंदिरों में दिए जलायेतीज, व्रत और त्यौहार कियेहमने पीपल के पेड़ पर बांधेमनोकामनाओं की धागे नदी से,पर्वत से,चांद से,पेड़ से ,भगवान सेदेव लोक के अमरत्व कीप्राथनाएँ कीहमने वह गीत गएजो देव लोक कोप्रिय थेहमने सजाया ख़ुद कोलगाया महावरअपने पैरों मेंपहनी हाथों में चूड़ियाँसजाई बिंदीऔर कमरबंदजब तक हम देवों के साथ थेउसके बाद छोड़ दिएसारे साजो श्रृंगारहमने टाल दी लड़ाइयां किए बहुत से समझौतेताकि हमारा देवत्वहमसे न रूठेहमने देखा कियह सब भी कम पड़ाखुद को देवीसाबित करने को","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}