{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Anupasthit Upasthit | Rajesh Joshi","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/86b88e2b\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":227,"description":"अनुपस्थित-उपस्थित | राजेश जोशी \n\nमैं अक्सर अपनी चाबियाँ खो देता हूँ\nछाता मैं कहीं छोड़ आता हूँ\nऔर तर-ब-तर होकर घर लौटता हूँ\nअपना चश्मा तो मैं कई बार खो चुका हूँ\nपता नहीं किसके हाथ लगी होंगी वे चीजें\nकिसी न किसी को कभी न कभी तो मिलती ही होंगी\nवे तमाम चीज़ें जिन्हें हम कहीं न कहीं भूल आए\nछूटी हुई हर एक चीज़ तो किसी के काम नहीं आती कभी भी\nलेकिन कोई न कोई चीज़ तो किसी न किसी के\nकभी न कभी काम आती ही होगी\nजो उसका उपयोग करता होगा\nजिसके हाथ लगी होंगी मेरी छूटी हुई चीजें\nवह मुझे नहीं जानता होगा\nहर बार मेरा छाता लगाते हुए\nवह उस आदमी के बारे में सोचते हुए\nमन-ही-मन शुक्रिया अदा करता होगा जिसे वह नहीं जानता\nइस तरह एक अनाम अपरिचित की तरह उसकी स्मृति में\nकहीं न कहीं मैं रह रहा हूँ जाने कितने दिनों से\nजो मुझे नहीं जानता\nजिसे मैं नहीं जानता\nपता नहीं मैं कहाँ -कहाँ रह रहा हूँ \nमैं एक अनुपस्थित-उपस्थित !\nएक दिन रास्ते में मुझे एक सिक्का पड़ा मिला\nमैंने उसे उठाया और आस-पास देखकर चुपचाप जेब में रख लिया\nमन नहीं माना, लगा अगर किसी ज़रूरतमन्द का रहा होगा\nतो मन-ही-मन वह कुढ़ता होगा\nकुछ देर जेब में पड़े सिक्के को उँगलियों के बीच घुमाता रहा\nफिर जेब से निकालकर एक भिखारी के कासे में डाल दिया\nभिखारी ने मुझे दुआएँ दीं\nउससे तो नहीं कह सका मैं\nकि सिक्का मेरा नहीं है\nलेकिन मन-ही-मन मैंने कहा\nकि ओ भिखारी की दुआओ\nजाओं उस शख्स के पास चली जाओ","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}