{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Bejagah | Anamika","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/88425d9c\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":195,"description":"बेजगह - अनामिका \n“अपनी जगह से गिर कर \nकहीं के नहीं रहते \nकेश, औरतें और नाख़ून”— \nअन्वय करते थे किसी श्लोक को ऐसे \nहमारे संस्कृत टीचर। \nऔर मारे डर के जम जाती थीं \nहम लड़कियाँ अपनी जगह पर। \nजगह? जगह क्या होती है? \nयह वैसे जान लिया था हमने \nअपनी पहली कक्षा में ही। \nयाद था हमें एक-एक क्षण \nआरंभिक पाठों का— \nराम, पाठशाला जा! \nराधा, खाना पका! \nराम, आ बताशा खा! \nराधा, झाड़ू लगा! \nभैया अब सोएगा \nजाकर बिस्तर बिछा! \nअहा, नया घर है! \nराम, देख यह तेरा कमरा है! \n‘और मेरा?’ \n‘ओ पगली, \nलड़कियाँ हवा, धूप, मिट्टी होती हैं \nउनका कोई घर नहीं होता। \nजिनका कोई घर नहीं होता— \nउनकी होती है भला कौन-सी जगह? \nकौन-सी जगह होती है ऐसी \nजो छूट जाने पर औरत हो जाती है। \nकटे हुए नाख़ूनों, \nकंघी में फँस कर बाहर आए केशों-सी \nएकदम से बुहार दी जाने वाली? \nघर छूटे, दर छूटे, छूट गए लोग-बाग \nकुछ प्रश्न पीछे पड़े थे, वे भी छूटे! \nछूटती गई जगहें \nलेकिन, कभी भी तो नेलकटर या कंघियों में \nफँसे पड़े होने का एहसास नहीं हुआ! \nपरंपरा से छूट कर बस यह लगता है— \nकिसी बड़े क्लासिक से \nपासकोर्स बी.ए. के प्रश्नपत्र पर छिटकी \nछोटी-सी पंक्ति हूँ— \nचाहती नहीं लेकिन \nकोई करने बैठे \nमेरी व्याख्या सप्रसंग। \nसारे संदर्भों के पार \nमुश्किल से उड़ कर पहुँची हूँ \nऐसी ही समझी-पढ़ी जाऊँ \nजैसे तुकाराम का कोई \nअधूरा अंभग! ","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}