{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Roshni | Rajesh Joshi","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/8848ada7\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":158,"description":"रौशनी | राजेश जोशीइतना अँधेरा तो पहले कभी नहीं थाकभी-कभी अचानक जब घर की बत्ती गुल हो जाती थीतो किसी न किसी पड़ोसी के घर जलाई गईमोमबत्ती की कमज़ोर सी रोशनीहमारे घर तक चली आती थीकभी-कभी सड़क की रोशनियाँ खिड़की से झाँक कर घर को रोशन कर देतींऔर कुछ नहींतो कहीं भीतरबची हुई कोई बहुत धुँधली सी ज़िद्दी रोशनीकम से कम इतना तो कर ही देती थीकि दीया सलाईऔर मोमबत्तियाँ ढूँढ़ कर, जला ली जाएँकोई कहता हैइतना अँधेरा तोपहले, कभी नहीं थाइतना अँधेरा तो तब भी नहीं थाजब अग्नि काठ में व पत्थर के गर्भ में छिपी थीतब इतना धुंधला नहीं था आकाशनक्षत्रों की रोशनी धरती तक ज़्यादा आती थीइतना अँधेरा तो पहले कभी नहीं थालगता है, ये सिर्फ़ हमारे गोलार्द्ध पर उतरी रात नहींपूरी पृथ्वी पर धीरे-धीरे फैलता जा रहा अंधकार हैअँधेरे में सिर्फ़ उल्लू बोल रहे हैंऔर उसकी पीठ पर बैठी देवीफिसल कर गिर गई है गर्त मेंइतना अँधेरा तो पहले कभी नहीं थाकि मुँह खोल कर अँधेरे को कोई अँधेरा न कह सकेकि हाथ को हाथ भी न सूझेकि आँख के सामने घटे अपराध की कोई गवाही न दे सकेइतना अँधेरा तो पहले कभी...","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}