{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Baad Ke Dinon Mein Premikayein | Rupam Mishra","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/884b1c68\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":165,"description":"बाद के दिनों में  प्रेमिकाएँ | रूपम मिश्रा \n\nबाद के दिनों में प्रेमिकाएँ पत्नियाँ बन गईं\nवे सहेजने लगीं प्रेमी को जैसे मुफलिसी के दिनों में अम्मा घी की गगरी सहेजती थीं\nवे दिन भर के इन्तजार के बाद भी ड्राइव करते प्रेमी से फोन पर बात नहीं करतीं\nवे लड़ने लगीं कम सोने और ज़्यादा शराब पीने पर\nप्रेमी जो पहले ही घर में बिनशी पत्नी से परेशान था\nअब प्रेमिका से खीजने लगा\nवो सिर झटक कर सोचता कि कहीं गलती से\nउसने फिर से तो एक ब्याह नहीं कर लिया\nपत्नियाँ जो कि फोन पर पति की लरजती मुस्कान देख खरमनशायन रहतीं\nउनकी अधबनी पूर्वधारणाएँ गझिन होतीं\nप्रेमी यहाँ भी चूकते, वे मुस्कान और सम्बन्ध दोनों सहेजने में नाकाम होते\nजबकि प्रेमिकाएँ यहाँ भी ज़िम्मेदार ही साबित रहीं\nवे खचाखच भरी मेट्रो और बस में भी हँसी के साथ इमेज भी मैनेज करतीं\nप्रेमिकाएँ भी खुद के पत्नी बनने पर थोड़ी-सी हैरान ही थीं\nआख़िर ये पत्नीपना हममें आता कहाँ से है\nप्रेमी खिसियाए रहे कि ये लड़कियाँ कभी कायदे से आधुनिक नहीं हो सकतीं\nहमेशा बीती बातें, बीती रातों के ही गीत गाती हैं \nख़ैर ये वो प्रेमी नहीं थे जो प्रेमिका का फोन खुद रिचार्ज कराते बाद उसका रोना रोते\nये करिअरिज्म व बाजार के दरमेसे प्रेमी थे जो जीवन की दौड़ में सरपट भाग रहे थे\nऔर इस दौड़ारी में प्रेम उनकी जेब से अक्सर गिर कर बिला जाता है।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}