{"type":"rich","version":"1.0","provider_name":"Transistor","provider_url":"https://transistor.fm","author_name":"Pratidin Ek Kavita","title":"Loktantrikta Mein Choona | Rupam Mishra","html":"<iframe width=\"100%\" height=\"180\" frameborder=\"no\" scrolling=\"no\" seamless src=\"https://share.transistor.fm/e/8f6e280f\"></iframe>","width":"100%","height":180,"duration":260,"description":"लोकतांत्रिकता में छूना।  रूपम मिश्र बुख़ार से देह इतनी निढाल है कि मौत से पहले ही माटी की लगने लगी हूँघर से दूर हूँ तो घर की ज़्यादा लगने लगी हूँकदमों में चलने की ताकत नहींपर दोस्त से झूठ कहती हूँ कि आराम हैघर जाने के लिए बस की एक सुरक्षित सीट पर पसर जाती हूँखिड़की के पास की सीट अपनी लगती हैक्यों कि उसके बाद कोई कहाँ धकेलेगाबस चली नहीं है और एक सज्जन बगल की सीट पर आ गये हैंकुछ नये रंगरुट से हैं पूछते हैं कहाँ पढ़ाती होतकलीफ़ इतनी है कि होंठ खुलना ही नहीं चाहते लेकिन जवाब तो देना थाकहा कहीं नहीं! सिर को आगे की सीट पर टिका दिया है जिसपर टेरीकॉट  कुर्ता पहने एक अधेड़ और उदास आदमी बैठा है जिसकी धुंवासी उंगलियों पर खड्डे ही खड्डे हैं वो मुझे चिर-परिचित सा लग रहा हैबाबतपुर हवाई अड्डे पर एक जहाज़ अभी उड़ान पर थीरास्ते में बाबतपुर हवाई अड्डे पर एक जहाज़ अभी उड़ान पर थीबगल में बैठे साहब मुझे खिड़की से जहाज़ दिखाने लगे देखो अब उड़ेगी !!पल भर को लगा जैसे कोई चीन्हार बच्ची को जादुई दुनिया दिखा रहा हो पितृ स्नेह को अहका मेरा मन सिर न उठाने की मंशा को त्याग कर उनका मन रखने को जहाज़ देखने लगादेह और मन दोनों इतने विक्लांत थे कि बार- बार देह का दाहिना हिस्सा किसी छुवन से खीजतापर भ्रम समझ फिर निढाल हो जातालेकिन अंततः देह ने कहा ये भ्रम नहीं है एक धृष्टता हैलेकिन विरोध का चेत न मन में है न देह मेंअंततः एक लोकतांत्रिक भाषा में धीमे से मैंने कहाभाई साहब आप मुझे न छुइये , देखिए मैंने अब तक एक बार भी आपको नहीं छुआ।","thumbnail_url":"https://img.transistorcdn.com/CI1fAMbZA7bkv2hnc9u5BTEVfgUAS1MWnukNGfD53r4/rs:fill:0:0:1/w:400/h:400/q:60/mb:500000/aHR0cHM6Ly9pbWct/dXBsb2FkLXByb2R1/Y3Rpb24udHJhbnNp/c3Rvci5mbS9zaG93/LzQwNDQzLzE2ODA1/MzYzNTQtYXJ0d29y/ay5qcGc.webp","thumbnail_width":300,"thumbnail_height":300}